राज्य
नीति

हिमाचल प्रदेश औद्योगिक नीति - 1996

सूचना स्रोत: उद्योग विभाग, हिमाचल प्रदेश सरकार

  1. पृष्ठभूमि

    1971 में राज्य का दर्ज़ा प्राप्त करने के बाद से ही, हिमाचल प्रदेश ने अंतर-क्षेत्रीय विकास की संतुलित नीति को अपनाया है जिससे राज्य की जनता के जीवन स्तर को बढ़ाने और संपूर्ण संपन्नता के उद्देश्य को प्राप्त किया जाए। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने की नीति ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। राज्य के तीव्र कृषि और बागवानी विकास ने अर्थव्यवस्था और जनता के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज राज्य में अन्न उत्पादन 14 लाख टन प्रतिवर्ष से अधिक है। सब्जियों का उत्पादन लगभग 5 लाख टन प्रतिवर्ष है। फल उत्पादन ने भी काफी वृद्धि दर्ज़ की है और यह 5 लाख टन प्रतिवर्ष है। परिणामस्वरूप, राज्य में प्रति व्यक्ति आय 1980-81 में 1704 रुपए से बढ़कर 1992-93 में 2012 रुपए हो गई है। आज गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों का प्रतिशत 30 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत की तुलना में केवल लगभग 9 प्रतिशत है। ऊर्जा क्षेत्र जिसे विकास के लिए एक संवेगी क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है, में आज राज्य हाइड्रोइलैक्ट्रिक ऊर्जा का सृजन कर रहा है। इसके साथ-साथ, वर्ष 2000 तक लगभग 2000 मेगावॉट अतिरिक्त हाइड्रोइलैक्ट्रिक ऊर्जा का सृजन किया जाएगा। राज्य में यातयात के योग्य सड़कों की लंबाई बढ़कर 19000 किलोमीटर से अधिक हो गई है और अन्य सड़कों के साथ आज राज्य के 7521 से अधिक गांव जुड़े हैं। राज्य का साक्षरता प्रतिशत अब 63.86 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। राज्य में कार्यरत् एक क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज सहित 37 तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान हैं। राज्य में आने वाले पर्यटकों की बहुसंख्या को देखते हुए पर्यटन क्षेत्र में भी आगामी वृद्धि की संभावना है। इस प्रकार तीव्र कृषि और औद्योगिक विकास, लाभदायक रोज़गारों के लिए तेजी से बढ़ते अवसरों, गरीबी में कमी और उसे मिटाने तथा सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को कम करने के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक सुदृढ़ आधार सृजित किया गया है।

  2. औद्योगिक नीति 1991:

    हिमाचल प्रदेश की पिछली औद्योगिक नीति की घोषणा 1991 में की गई थी। तब से लेकर अब तक, देश में आर्थिक नीति वातावरण में काफी परिवर्तन हो गए हैं। इसलिए, विद्यमान औद्योगिकी नीति की समीक्षा करना और परिवर्तित आर्थिक परिदृश्य में औद्योगिकी विकास की राज्य सरकार की नीति की स्पष्ट व्याख्या करना आवश्यक हो गया है। 1991 के औद्योगिक नीति कथन में निम्नलिखित उद्देश्यों को रखा गया है:

  3. क. सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का अधिक भाग

    ख. योजनाओं में औद्योगिक क्षेत्र को उच्चतर प्राथमिकता

    ग. रोज़गार के नए क्षेत्रों का सृजन

    घ. संसाधनों और स्थानीय कच्चे माल का अधिकतम उपयोग

    ङ. उद्योगों का भौगोलिक फैलाव

    च. सार्वजनिक/निजी क्षेत्र की भूमिका

    छ. अन्य क्षेत्रों के विकास के साथ एकीकृत औद्योगिक विकास

    ज. उत्पादकता उन्नयन, प्रौद्योगिकीय उन्नयन और अनिवासी भारतीयों द्वारा निवेश

  4. वर्तमान स्थिति::

    भारत सरकार द्वारा जुलाई 1991 में प्रारंभ की गई आर्थिक सुधार की प्रक्रिया और लाइसेंसराज की समाप्ति तथा चिह्नित क्षेत्रों में विदेशी निवेश के स्वयंमेव अनुमोदनों के रूप में परिणामिक औद्योगिक नीति सुधारों/पहलों ने महत्वपूर्ण निवेशक हितों का सृजन किया है। हिमाचल प्रदेश में औद्योगिकरण की प्रगति को निम्नलिखित आंकड़ों से मापा जा सकता है:

मध्य और बड़ी इकाइयां - अनुमोदन

वर्ष स्थापना के लिए अनुमोदित बड़ी और मध्यम इकाइयों की संख्याप्रस्तावित निवेश(करोड़ रुपए में) अनुमानित रोज़गार    
1991-92 12 340 4709
1992-93 20 617 8779
1993-94 36 704 9433
1994-95 41 1460 14380
1995-96 37 (12/95 तक) 940 5800

मध्य और बड़ी इकाइयां - वास्तविक

वर्षराज्य में कार्यरत् बड़ी और मध्य इकाइयों की संख्या निवेश (करोड़ रुपए में) रोज़गार
1991-92 133 350 15000
1992-93 136 500 15500
1993-94 140 532 17000
1994-95 146 867 21000
1995-96 153 (12/95 तक) 963 22629

लघु इकाइयां - वास्तविक

वर्षराज्य में कार्यरत् लघु इकाइयों की संख्या निवेश (करोड़ रुपए में) रोज़गार
1991-92 <21518 248.08 84261
1992-93 22440 <289.28 90802
1993-94 23265 350.20 94676
1994-95 24121 <412.00 99504
1995-96 24587 (12/95 तक) 436.00 101554

    औद्योगिक उदारीकरण ने निवेश के प्रवाह में स्पष्ट रूप से वृद्धि की है। यह भी सत्य है कि जो राज्य उद्योग के लिए आवश्यक संरचनात्मक ढांचा प्रदान करते हैं, वे अधिक निवेश को आकर्षित करते हैं। इस प्रकार संरचनात्मक बाधाओं को हटाना और प्रशासनिक दिक्कतों को दूर करना राज्य में अधिक और बेहतर निवेश को आकर्षित करने के लिए पूर्वापेक्षा है।

  1. नई औद्योगिक नीति की आवश्यकता

    वर्तमान समय की आर्थिक स्थिति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए यह आवश्यक है कि नई नीति पहल की जाएं और विद्यमान औद्योगिक नीति की समीक्षा की जाए। यह निवेशकों को राज्य के तीव्र औद्योगिकरण के लिए राज्य सरकार की वचनबद्धता का संकेत देने और राज्य में एक निवेशक सापेक्ष वातावरण बनाने के लिए भी आवश्यक है। यह सुनिश्चित करने की भी राज्य सरकार की इच्छा है कि औद्योगिकरण का लाभ एक संभव सीमा तक राज्य के विभिन्न भागों में पहुंचे।

  2. प्राथमिकता वाले नए क्षेत्र जहां कार्रवाई अपेक्षित है

    राज्य सरकार को आधारभूत संरचना जैसे ऊर्जा, सड़कें, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के प्रावधान में एक संपूरक भूमिका निभानी चाहिए और ऊर्जा, भूमि तथा पानी जैसे आवश्यक निवेशों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायित्व लेना चाहिए। उसी समय राज्य सरकार की बड़ी संख्या में नियंत्रणों और विनियमों जो उद्योग पर एक बोझ हैं, को कम करने की इच्छा है। यह भी अनुभव किया गया है कि राज्य सरकार एक उपयुक्त और प्रेरक कराधान नीति के माध्यम से व्यापार की गई और उत्पादित वस्तुओं की आवाजाही को निदेश देने और चैनलाइज़ करने की अपनी शक्तियों के प्रयोग द्वारा निवेश के लिए एक आदर्श वातावरण बनाने में एक प्रमुख भूमिका निभा सकती है। औद्योगिक नीति की समीक्षा का उद्देश्य निजी पहल और उद्यम को प्रोत्साहन देना और अनावश्यक विलंबों तथा अनुचित विनियमों को समाप्त करना है।