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राज्य नीति | |
मणिपुर की औद्योगिक नीति, 1996
1972 में राज्य का दर्जा प्राप्त करने के बाद से ही, मणिपुर राज्य सरकार अपनी रणनीतियों जो राज्य के समक्ष विद्यमान भौगोलिक कठिनाइयों को दूर कर सकती हैं और जो इसकी उत्पादक क्षमताओं तथा व्यापक मानव संसाधन पूंजी का उपयोग कर सकती हैं, के माध्यम से संतुलित आर्थिक विकास के लिए निरंतर प्रयास करती रही है। इन आधारभूत उद्देश्यों को प्राप्त करने की अनुभवजनित आवश्यकता की अभिस्वीकृति में, राज्य सरकार उन नीतियों जो पुन: विकास को उत्प्रेरित कर सकती हैं, सामाजिक असमानता और गरीबी को कम कर सकती हैं, निवेश के सुसंगत एक वातावरण सृजित कर सकती हैं और विशेष रूप से उद्यमियों तथा शिक्षित बेरोज़गारों के लिए लाभदायक रोज़गार उत्पन्न कर सकती हैं, के प्रति अपने वचनबद्धता को जारी रखेगी।
इन आधारभूत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, तीव्र औद्योगिकरण का संवर्धन सरकार की प्रमुख नीति है। यह नीति 1991 के बाद तेजी से बदलते राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य के साथ औद्योगिक संवर्धन प्रयासों को जोड़ेगी। तदनुसार, राज्य सरकार आर्थिक, औद्योगिक, वाणिज्यिक, वित्तीय गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में भारत सरकार की नीतिगत पहलों का ध्यान रखती है जोकि इसके साथ-साथ निम्नलिखित की प्राप्ति के लिए प्रयास करती हैं:-
राज्य सरकार इस तथ्य से अवगत है कि जबकि देश में बदलते हुए आर्थिक और औद्योगिक वातावरण ने निवेशकों और उद्यमियों को उनकी रुचि के अनुसार आर्थिक/औद्योगिक गतिविधि के लिए इकाइयां स्थापित करने की स्वतंत्रता प्रदान की है, इस स्वतंत्रता का औद्योगिक रूप से विकसित, आर्थिक रूप से सुदृढ़ और भौगोलिक रूप से लाभ की स्थिति वाले राज्यों में अधिक कार्यान्वयन होने की संभावना है। निवेशकों/उद्यमियों की इन राज्यों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होने की संभावना है जहां ये लाभ इन राज्यों द्वारा प्रस्तुत आकर्षक प्रोत्साहन/सब्सिडी के साथ संलग्न हैं। ऐसी स्थिति में, मणिपुर में औद्योगिक संवर्धन के लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है जो न केवल सब्सिडी/प्रोत्साहन व्यवस्था पर निर्भर हो अपितु राज्य की संभावनाओं का दोहन करे और इसकी बाधाओं को दूर करे।
1982 से पहले, औद्योगिक विकास के लिए योजना और नीति का संचालन विशिष्ट निर्देशों/आदेशों/दिशानिर्देशों के माध्यम से किया जाता था। 1982 की औद्योगिक नीति मणिपुर के औद्योगीकरण से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की अनुभूति की संपार्श्विकता के लिए प्रथम प्रयास था। इसने बड़े और मध्यम उद्योगों के विकास पर प्राथमिक रूप से बल दिया। 1990 की औद्योगिक नीति ने प्रमुख रूप से लघु उद्योग क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ बड़े और मध्यम क्षेत्र के उद्योगों के विकास की ओर भी पूरा ध्यान दिया। संक्षेप में, यद्यपि दोनों नीति पहल मुख्यत: प्रोत्साहन/सब्सिडी व्यवस्था पर निर्भर थीं, यह आशा थी कि यह व्यवस्था मणिपुर में गंभीर और तात्विक निवेश के प्रति निवेशकों और उद्यमियों की सुस्ती/अनिच्छा को दूर करने के लिए पर्याप्त रूप से आकर्षक होगी।
परिणामस्वरूप, राज्य सरकार की इन नीतियों की घोषणा का औद्योगिक निवेश और विकास पर सीमित प्रभाव हुआ था, राज्य औद्योगिक गतिविधि के वांछित स्तर का साक्षी नहीं बन पाया। इसका प्राथमिक कारण था कि इन नीति पहलों में निम्नलिखित तत्व नहीं थे :-
उपरोक्त पृष्ठभूमि में, राज्य सरकार का यह दृढ़ मत है कि मणिपुर की एक रचनात्मक औद्योगिक नीति को स्वयं को इसकी सुदृढ़ता और लाभ, स्पष्ट हो चुकीं विकृतियों और दुर्बलताओं को ठीक करने, राष्ट्रीय/क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मकता की प्राप्ति, उत्पादकता में बढ़ोतरी, एक अनुकूल वातावरण के सृजन, और एक पर्यावरण-सापेक्ष रूप में प्राकृति संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर निर्मित करने वाली होना चाहिए। नए क्षितिजों की खोज "परिवर्तन के साथ निरंतरता" और राज्य के आर्थिक तथा प्राकृतिक दोनों संसाधनों के लागत-प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करने की आवश्यकता द्वारा सुदृढ़ किए जाएंगे। सभी क्षेत्रों (लघु, मध्य अथवा बड़े), चाहे सार्वजनिक/निजी/संयुक्त हों, को प्रोत्साहित किया जाएगा।
उपरोक्त रेखांकित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए, राज्य सरकार ने निम्नलिखित विवरणानुसार एक नई औद्योगिक नीति को अपनाने का निर्णय किया है :-
क. एक एकीकृत निवेशक-सापेक्ष वातावरण का सृजन
राज्य सरकार की मान्यता है कि निरंतर आर्थिक गतिविधि के लिए कानून और व्यवस्था का सुरक्षित वातावरण एक अनिवार्य पूर्वापेक्षा है। तदनुसार, राज्य सरकार न केवल ऐसा वातावरण प्रदान करने की अपनी वचनबद्धता को रेखांकित करेगी, अपितु राज्य में सभी प्रमुख औद्योगिक निवेश को आवश्यक सुरक्षा छत्र का मूल्यांकन करने और उसे प्रदान करने के लिए एक विशेष निगरानी कक्ष की स्थापना भी करेगी।
निवेश को सुगम बनाने के लिए, राज्य सरकार एक एकल-खिड़की सुविधा/सुरक्षा तंत्र की स्थापना करेगी जो एक औद्योगिक इकाई की तीव्र स्थापना के लिए अनिवार्य सभी सेवाओं और अनुमतियों को प्रदान अथवा समन्वय करेगा।
राज्य सरकार मणिपुर में उपलब्ध औद्योगिक अवसरों के साथ निवेशकों को परिचित कराने के लिए प्रचार और निवेश संवर्धन हेतु एक कार्यक्रम प्रारंभ करेगी।
राज्य सरकार एक प्रभावी निवेश वातावरण के सृजन के लिए वित्तीय सहायता हेतु विशेष श्रेणी के राज्यों और अभ्यर्थियों के औद्योगिकरण में केंद्रीय सरकार की हस्तक्षेप वाली भूमिका की अपेक्षा करेगी। इसके अतिरिक्त, राज्य केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना के लिए भारत सरकार पर दबाव डालता रहेगा जो अनुषंगी इकाइयों के विकास को भी उत्प्रेरित कर सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए, एक मंत्रिमंडलीय उप-समिति और/अथवा सचिवों की एक समिति को प्रोत्साहनों के एक पैकेज जो मणिपुर में एक केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम की स्थापना पर विचार करने के इच्छुक केंद्रीय मंत्रालय को प्रस्तुत किया जा सके, हेतु पहल और विचार-विमर्श करने हेतु प्राधिकृत किया जाएगा।
राज्य सरकार संयुक्त क्षेत्र उद्यमों में निजी निवेशकों द्वारा बहुसंख्या में भागीदारी पर वैयक्तिक योग्यता के आधार पर विचार करेगी।
ख. संरचनात्मक विकास/सहायता
1. राज्य सरकार संरचनात्मक सहायता/विकास के लिए एक एकीकृत नीति को आत्मसात करेगी। तालयेलपात औद्योगिक क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं के उन्नयन के अतिरिक्त, राज्य सरकार निम्नलिखित का चरणबद्ध विकास करेगी:
चंदेल जिले के मोरे में एकीकृत संरचनात्मक विकास केंद्र।
सेनापति जिले के कुक्चिंग में निर्यात संवर्धन औद्योगिक पार्क।
चंदेल जिले के मोरे में निर्यात संसाधन क्षेत्र।
सेनापति जिले के कंगीलाटोंगली में औद्योगिक विकास केंद्र।
उद्योगों के संतुलित फैलाव को प्रेरणा देने के लिए जीरीबाम (इम्फाल), लिटान (उखराल), नोनी (तामेंगलोंग) और नाम्बोल (बिश्नुपुर) में चार अतिरिक्त औद्योगिक स्थल।
उपरोक्त केंद्र औद्योगिक इकाइयों की स्थापना/कार्य संचालन के लिए आवश्यक सुनिश्चित सुरक्षा, पानी, विद्युत, संचार और अन्य आधारभूत सुविधाएं प्रदान करेंगे।
इस जिले का विकास पर्यावरणीय/पारिस्थितिकीय प्राथमिकताओं के सुसंगत होगा।
राज्य सरकार शीत भंडारण, पैकिंग हाउस, प्री-कूलिंग सुविधाओं, रेफ्रीजिरेशन आदि जैसी सहायक संरचनाओं के सृजन को प्रोत्साहित करेगी।
राज्य सरकार भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी), मणिपुर औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड और राष्ट्रीयकृत बैंकों के माध्यम से औद्योगिक परियोजनाओं विशेषकर लघु उद्योग क्षेत्र के संबंध में वित्तीय ऋण/सहायता/संपर्क जुटाने को प्राथमिकता देगी। पूर्वोत्तर विकास वित्तीय संस्थान (एनईडीएफआई) से भी सहायता जुटाई जाएगी। राज्य सरकार औद्योगिक इकाइयों की वित्तीय आवश्यकताओं के लिए समन्वय और सुगमता प्रदान करने हेतु एक उपयुक्त अधिकारिक तंत्र की स्थापना पर विचार करेगी।
ग. संसाधन उपयोग को अधिकतम करना
राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और संभाव्यताओं को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार निम्नलिखित क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश को प्राथमिकता प्रदान करेगी:
कृषि आधारित उद्योग।
- खनिजों और अपशिष्टों सहित स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल पर आधारित उद्योग।
- स्थानीय/क्षेत्रीय मांग के अनुसार उत्पाद।
- सभी इकाइयां जो भारत-म्यान्मार सीमा व्यापार का लाभ उठा सकें।
- हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र।
- इलैक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र।
- पैट्रोल रसायन आधारित उद्योग।
- वन आधारित उद्योग जो वृक्षों का अवक्षय न करें।
- निर्यातोन्मुख गतिविधियां/उद्योग।
- सभी प्रदूषणमुक्त, श्रम सघनता वाली इकाइयां।
- गैर-परंपरागत ऊर्जा उपकरणों, प्रणालियों/प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करने वाली इकाई।
राज्य सरकार लाइमस्टोन, क्रोमेट, सोपस्टोन, सरपेन्टाइन, इन्डोर्स आदि खनिज संसाधनों की संभाव्यताओं, दोहन, संसाधन और विपणन का संवर्धन करेगी।
राज्य सरकार पर्यटन को उद्योग का दर्जा देगी और तदनुसार सभी अनुमेय सहायता प्रदान करेगी।
घ. प्रतिस्पर्धात्मकता, गुणवत्ता सुधार, कौशल उन्नयन
गुणवत्ता और प्रौद्योगिकी का उन्नयन घरेलू बाज़ार और निर्यात लक्ष्यों को पूरा करने में प्रतिस्पर्धात्मकता प्राप्ति में प्रमुख प्रेरक हैं। लघु उद्योग क्षेत्र में विनिर्माण इकाइयों की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने की दृष्टि से, आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए कार्यक्रम कार्यान्वित किए जाएंगे। उनमें प्रौद्योगिकी केंद्रों, टूल रूम और अन्य परीक्षण सुविधाओं की स्थापना के लिए भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (आईडीबीआई), लघु उद्योग सेवा संस्थान, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम और इलैक्ट्रॉनिक्स विभाग जैसे केंद्रीय सरकार के संगठनों को आमंत्रित करके वित्तीय प्रोत्साहनों और प्रशिक्षण में सुधार का एक पैकेज सम्मिलित होगा।
निर्यातोन्मुख विनिर्माता/संसाधन उद्योगों के लिए संयंत्र अध्ययन में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, व्यापार और विपणन गतिविधियों पर विचार-विमर्शों के खुले सत्रों/सेमिनारों का आयोजन किया जाएगा।
राज्य सरकार उद्यमिता कौशलों के विकास के लिए कार्यक्रमों को प्राथमिकता देगी।
ङ. औद्योगिक रुग्णता
राज्य सरकार औद्योगिक रुग्णता की समस्या को संसाधनों के साथ देखती है और उन रुग्ण उद्योगों की सहायता का प्रयास करेगी जिन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है।
राज्य सरकार ने पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र के रुग्ण उपक्रमों के पुनर्वास के लिए एक विस्तृत कार्यक्रम प्रारंभ कर दिया है। इन्हें निजी साझेदारों के सहयोग से संयुक्त क्षेत्र की इकाइयों में परिवर्तित करने की संभावना खोजी जाएगी और प्राथमिकता दी जाएगी जिसके बाद निजीकरण पर विचार किया जाएगा।
लघु उद्योग क्षेत्र की इकाई के लिए, रुग्ण इकाइयों की निगरानी हेतु वाणिज्य और उद्योग निदेशालय में एक कक्ष खोला जाएगा। प्रारंभ में, पुनर्जीवन के लिए उनकी संभावनाओं के अनुसार इन रुग्ण इकाइयों को श्रेणीबद्ध करने हेतु राज्य में विद्यमान लघु उद्योग इकाइयों का एक सर्वेक्षण किया जाएगा। इस सर्वे के आधार पर, जहां लागत-प्रभावी हो, इन रुग्ण इकाइयों को जीवनक्षम बनाने के लिए नीति उपायों के एक पैकेज को प्रारंभ किया जाएगा।
च. भारत-म्यान्मार सीमा व्यापार का संवर्धन
राज्य सरकार चंदेल जिले के मोरे में म्यान्मार के साथ बनाई गई सीमा को खोलने से प्रस्तुत लाभों के अनुकूलन के लिए सकारात्मक कदम उठाएगी।
वाणिज्य और उद्योग निदेशालय में एक निर्यात-कक्ष नोडल एजेंसी होगा, जो निम्नलिखित कार्य करेगा:
छ. प्रोत्साहनों/सब्सिडी का पैकेज
औद्योगिक विकास के लिए नीति के एक अभिन्न अंग के रूप में, राज्य सरकार इस नीति के अनुबंध-1 में वर्णित प्रोत्साहनों/सब्सिडी का एक समन्वित और आकर्षक पैकेज भी प्रदान करेगी। ये पैकेज केंद्रीय योजनाओं के अंतर्गत उपलब्ध ऐसे प्रोत्साहनों/सब्सिडी के अनुपूरक और/अथवा उनके अतिरिक्त होंगे।
क. प्रोत्साहनों/सब्सिडी का नया पैकेज, जिसे इसके बाद प्रोत्साहन योजनाएं 1996 कहा गया है, औद्योगिक नीति संकल्प, 1996 के प्रवर्तन की तिथि से प्रभावी होगा और औद्योगिक नीति, 1990 के अंतर्गत निर्धारित सभी प्रावधानों का संचालन रुक जाएगा, सिवाय जहां अन्यथा प्रदान किए गए हैं।
ख. औद्योगिक नीति 1996 के अंतर्गत प्रोत्साहनों/सब्सिडी का नया पैकेज औद्योगिक इकाइयों के लिए केवल तभी पात्र होगा जब इकाई वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ कर देगी।
ग. विद्यमान उद्योग जो औद्योगिक नीति, 1990 के अंतर्गत प्रोत्साहन प्राप्त कर रहे हैं, समान प्रोत्साहनों का लाभ प्राप्त करते रहेंगे।
औद्योगिक नीति, 1990 के अंतर्गत प्राप्त प्रोत्साहन सभी इकाइयों जिन्होंने 1-2-1990 और इस नई नीति की प्रभावी तिथि के मध्य वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ किया है, को प्रत्येक मामले के आधार पर उपलब्ध रहेंगे। यद्यपि, ये इकाइयां औद्योगिक नीति, 1996 के अंतर्गत उपलब्ध लाभों का विकल्प देने के लिए भी पात्र होंगी।
नई औद्योगिक नीति, 1996 की प्रभावी तिथि को अथवा उसके बाद स्थापित नई इकाइयां और विस्तार/आधुनिकीकरण/विविधिकरण करने वाली विद्यमान इकाइयां ही नई नीति व्यवस्था के अंतर्गत प्रोत्साहनों/सब्सिडी के लिए पात्र होंगी।
1.1.1995 को अथवा उसके बाद वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ करने वाली एक आद्योगिक इकाई को नई इकाई माना जाएगा।
एक औद्यागिक इकाई जो 1.1.1995 से पहले किसी भी समय वाणिज्यिक उत्पादन में है/थी, को प्रोत्साहन योजना 1996 के उद्देश्य के लिए एक विद्यमान इकाई माना जाएगा।
"कमजोर वर्गों" से तात्पर्य अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, शारीरिक विकलांग, अन्य पिछड़े वर्ग और महिला उद्यमियों से होगा।
महिलाओं द्वारा स्थापित एक औद्योगिक इकाई जिसमें महिला उद्यमियों के शेयर 51 प्रतिशत से कम न हों, को महिला उद्यमियों द्वारा प्रबंधित और चलाई जा रही इकाई माना जाएगा।
अपने उत्पादन अथवा प्रौद्योगिकी का न्यूनतम 30 प्रतिशत निर्यात करने वाली एक औद्योगिक इकाई को मणिपुर की औद्योगिक नीति, 1996 के उद्देश्य के लिए एक निर्यातोन्मुख इकाई (ईओयू) माना जाएगा।
एक विद्यमान औद्योगिक इकाई का विस्तार/आधुनिकीकरण/विविधिकरण भी प्रोत्साहनों के लिए पात्र होगा, यदि संयंत्र और मशीनरी पर उसका पूंजी निवेश विद्यमान इकाई के सकल स्थाई पूंजी निवेश के 25 प्रतिशत से अधिक है। विस्तार विद्यमान क्षमता में न्यूनतम 25 प्रतिशत बढ़ोतरी से अनुक्रमबद्ध होना चाहिए और इकाई को अनुमेय प्रोत्साहन पैकेज केवल विस्तृत भाग से संबंधित होगा। इस गणना के उद्देश्य के लिए, इकाई की भूमि, भवन, संयंत्र और मशीनरी पर किए गए पूंजी निवेश के कम आंके गए मूल्य पर विचार किया जाएगा।
अनुबंध-1 प्रोत्साहनों/सब्सिडी का पैकेज
(औद्योगिक नीति, 1996 के अनुच्छेद 7 (छ) के अंतर्गत)
राज्य सरकार उद्योगों और औद्योगिक/आर्थिक निवेशों को सुदृढ़ करने के लिए भारत सरकार द्वारा प्रदत्त प्रोत्साहनों/सब्सिडी के अलावा, प्रोत्साहनों/सब्सिडी के निम्नलिखित अनुपूरक और/अथवा अतिरिक्त पैकेज प्रस्तुत करेगी:
1. भूमि का आवंटन
राज्य सरकार (क) प्रमुख संरचनात्मक केंद्रों में सभी संरचनात्मक सुविधाओं के साथ विकसित भूमि और (ख) अविकसित भूमि प्रदान करने का प्रयास करेगी। "सेवा" और ग्रामीण उद्योग क्षेत्र में कार्यरत नई इकाइयों के अलावा, सभी नई इकाइयां इसके लिए पात्र होंगी।
क. विकसित भूमि 30 वर्षों की अवधि के लिए पट्टा आधार पर आवंटित की जाएगी।
ख. राज्य सरकार निम्नलिखित दरों पर भूमि की लागत पर सब्सिडी प्रदान करेगी:
लघु उद्योग 25 प्रतिशत
निर्यातोन्मुख और कमज़ोर वर्गों के स्वामित्व और प्रबंध वाली इकाइयां 30 प्रतिशत
बड़ी और मध्यम इकाइयां 15 प्रतिशत
ग. भूमि को विकसित करने की लागत औद्योगिक इकाई से 15 समान वार्षिक किश्तों में वसूली जाएगी।
घ. सरकार औद्योगिक इकाइयों के लिए आवंटन हेतु एक समिति का गठन करेगी और आवंटन नियम बनाएगी जिन्हें अधिसूचित किया जाएगा।
2. लघु उद्योग इकाइयों को शेड का आवंटन
सरकार लघु उद्योग इकाइयों को मासिक किराया आधार पर निर्मित फैक्टरी शेड प्रदान करने का प्रयास करेगी। राज्य सरकार मासिक किराए में सभी श्रेणियों के उद्यमियों के लिए 50 प्रतिशत और निर्यातोन्मुख तथा कमज़ोर वर्गों द्वारा स्थापित इकाइयों के लिए 55 प्रतिशत सब्सिडी देगी। यह सब्सिडी शेड का कब्जा लेने की तिथि से 5 वर्षों की अवधि के लिए होगी।
3. श्रमशक्ति का विकास
औद्योगिक इकाइयां जो अपने श्रमिकों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए सरकारी मान्यताप्राप्त/पुनर्प्रदत्त प्रशिक्षण संस्थानों और/अथवा स्थापित औद्योगिक फर्मों में प्रतिनियुक्त करती हैं, सब्सिडी के लिए पात्र होंगी बशर्तें कि वे वचन दें कि ऐसे सभी प्रशिक्षित लोगों को प्रशिक्षण के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद उनके द्वारा नियुक्त कर लिया जाएगा। सब्सिडी की राशि वास्तविक व्यय की 50 प्रतिशत अथवा प्रति प्रशिक्षार्थी 3500 रुपए, जो भी कम हो, होगी। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों द्वारा प्रबंधित इकाइयों के मामले में 4000 रुपए की सीमा के अध्यधीन, किराया व्यय पर 60 प्रतिशत बढ़ी हुई सब्सिडी उपलब्ध होगी।
4. राज्य पूंजी निवेश सब्सिडी
राज्य सरकार 15 लाख रुपए प्रति इकाई की सीमा के अध्यधीन, प्राथमिक क्षेत्र के उद्योगों को संयंत्र और मशीनरी के सकल स्थाई पूंजी निवेश पर 15 प्रतिशत की दर से सब्सिडी प्रदान करेगी। सब्सिडी की अनुप्रयोज्य दर और "प्राथमिक" क्षेत्र में सम्मिलित उद्योगों को समय-समय पर उद्योग विभाग द्वारा अधिसूचित किया जाएगा। निर्यातोन्मुख इकाइयों के लिए, अधिकतम 20 लाख रुपए प्रति इकाई के अध्यधीन, सब्सिडी की दर 20 प्रतिशत होगी।
5. राज्य परिवहन सब्सिडी
सरकार कच्चे माल और तैयार उत्पादों के परिवहन के लिए समय-समय पर अधिसूचित होने वाली दरों पर परिवहन सब्सिडी प्रदान करती रहेगी।
क. सब्सिडी कोलकाता/पटना/सिलीगुड़ी अथवा पूर्वोत्तर क्षेत्र के किसी अन्य स्थान से सड़क मार्ग द्वारा मणिपुर में औद्योगिक इकाई के स्थान तक कच्चे माल के परिवहन के लिए अनुमेय होगी।
ख. यह सब्सिडी सड़क मार्ग द्वारा मणिपुर में औद्योगिक इकाई के स्थान से सिलीगुड़ी तक तैयार उत्पादों के परिवहन के लिए भी अनुमेय होगी। सड़क मार्ग द्वारा तैयार माल के कोलकाता/पटना तक परिवहन के लिए सब्सिडी पर प्रत्येक मामले के आधार पर विचार किया जाएगा। निर्यातोन्मुख इकाइयों के लिए, तैयार माल पर सब्सिडी कार्य-स्थल से अंतिम शिपिंग बिंदु तक उपलब्ध होगी।
ग. कच्चे माल और/अथवा तैयार उत्पादों पर परिवहन सब्सिडी अनुमेय होगी, यदि कच्चे माल पर मूल्य संवर्धन 25 प्रतिशत से अधिक है।
घ. कच्चे माल के लिए केवल उसी मात्रा पर परिवहन सब्सिडी अनुमेय होगी जो स्थानीय रूप से उपलब्ध मात्रा से अधिक होगी और जो पूर्ण क्षमता उपयोग के लिए अनिवार्य है।
ङ. एक साथ कच्चे माल और तैयार उत्पादों के मामले में परिवहन सब्सिडी के लिए अधिकतम अनुमेय राशि सरकार द्वारा अनुमोदित दर के अनुसार परिवहन की वास्तविक लागत अथवा 30.00 लाख रुपए प्रतिवर्ष, जो भी कम है, होगी।
च. मणिपुर औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड, मणिपुर इलैक्ट्रॉनिक्स विकास निगम लिमिटेड, मणिपुर हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट विकास निगम लिमिटेड, मणिपुर विकास सोसायटी लिमिटेड और मणिपुर हैंडलूम बुनकर सहकारी सोसायटी लिमिटेड हेतु सब्सिडी सड़क परिवहन के लिए 100 प्रतिशत की दर से और वायु परिवहन के लिए 75 प्रतिशत की दर से (एयर कार्गो द्वारा अधिकतम 1.00 लाख रुपए) अनुमेय होगी।
6. ब्याज सब्सिडी
लघु उद्योगों को कार्यशील पूंजी और बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों से लिए गए सावधि ऋण पर 5 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी। यह सब्सिडी वाणिज्यिक उत्पादन की तिथि से अथवा रुग्ण इकाइयों के पुनर्जीवन के मामले में ऋण जारी होने की तिथि से पांच वर्षों के लिए उपलब्ध होगी। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में, सब्सिडी 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष होगी। यद्यपि, कार्यशील पूंजी के मामले में सब्सिडी वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ होने के पांच वर्षों की अवधि के दौरान वाणिज्यिक उत्पादन में होगी।
7. विद्युत सब्सिडी
क. सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित दरों पर वाणिज्यिक उत्पादन की तिथि से प्रथम 5 वर्षों के लिए लघु उद्योगों को विद्युत सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
ख. ऐसी इकाइयों जिन्हें विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि प्रदान की गई है, के लिए 50,000 रुपए की सीमा के अध्यधीन, मुख्य लाइन से फैक्टरी शेड तक विद्युत संपर्क पर आई लागत की 50 प्रतिशत सब्सिडी दी जाएगी। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में, प्रति इकाई अधिकतम 55,000 रुपए के अध्यधीन, सब्सिडी 55 प्रतिशत होगी।
ग. 10 एच.पी. अथवा अधिक के डीजल जेनरेटिंग सैटों की खरीद के लिए 30,000 रुपए की सीमा के अध्यधीन 25 प्रतिशत सब्सिडी अनुमेय होगी। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में, न्यूनतम 36,000 रुपए के अध्यधीन, सब्सिडी 30 प्रतिशत होगी।
8. संभाव्यता अध्ययन और परियोजना तैयारी के लिए सब्सिडी
प्रत्येक मामले में अधिकतम 25,000 रुपए की सीमा के अध्यधीन, संभाव्यता अध्ययन और परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की लागत की पूर्ति के लिए 50 प्रतिशत सब्सिडी अनुमेय होगी। अध्ययन रिपोर्ट मणिपुर सरकार अथवा भारत सरकार के साथ पंजीकृत एक अनुमोदित परामर्शदाता द्वारा तैयार की जानी चाहिए। मणिपुर हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट विकास निगम, मणिपुर विकास सोसायटी और मणिपुर राज्य हैंडलूम बुनकर सहकारी सोसायटी भी सब्सिडी के लिए पात्र होंगे। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में 30,000 रुपए की सीमा के अध्यधीन 60 प्रतिशत की दर पर बढ़ी हुई सब्सिडी अनुमेय होगी।
9. तकनीकी जानकारी के लिए सब्सिडी
मणिपुर सरकार द्वारा अग्रिम रूप से अनुमोदित संगठनों से प्रत्येक मामले के आधार पर एक लघु उद्योग इकाई द्वारा प्राप्त तकनीकी जानकारी की लागत की पूर्ति के लिए 50 प्रतिशत की सब्सिडी अनुमेय होगी। सब्सिडी को केवल वाणिज्यिक उत्पादन के प्रारंभ होने पर ही जारी किया जाएगा। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में सब्सिडी 60 प्रतिशत होगी।
10. मूल्य वरीयता
राज्य सरकार अपनी मूल्य वरीयता की नीति जारी रखेगी, जिसके अंतर्गत सरकारी विभाग, अर्ध-सरकारी संगठन, स्वायत्तशासी सरकारी संगठन, बड़े सहायता-संस्थान, विभागीय उपक्रम, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम आदि उत्पाद उद्योगों को पहली प्राथमिकता देंगे। अन्य बातें समान होने पर, ऐसी इकाई को अन्यों द्वारा प्रस्तुत तकनीकी और वाणिज्यिक रूप से न्यूनतम जीवनक्षम दर से 20 प्रतिशत अधिक तक मूल्य वरीयता दी जाएगी।
11. स्थानीय बिक्रीकर की प्रतिपूर्ति और छूट
क. मणिपुर औद्योगिक विकास निगम कच्चे माल की बिक्री पर स्थानीय कर की प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होगा।
ख. सीधे कच्चा माल खरीदने वाली वैयक्तिक इकाइयों के लिए, उनके द्वारा भुगतान किए गए किसी बिक्रीकर के विरुद्ध संपूर्ण कर समाप्ति के रूप में कच्चे माल के मूल्य के 4 प्रतिशत की रियायती दर अनुमेय होगी।
ग. औद्योगिक इकाइयों द्वारा निर्मित वस्तुओं पर बिक्रीकर पर वाणिज्यिक उत्पादन की तिथि से 10 वर्षों की अवधि के लिए पूर्णत: छूट दी जाएगी। यद्यपि, राज्य सरकार के अनुमोदन से कमज़ोर वर्गों के मामले में पात्रता की अवधि को 2 (दो) वर्षों के लिए बढ़ा दिया जाएगा।.
घ. मणिपुर हथकरघा और हस्तशिल्प विकास निगम तथा मणिपुर राज्य हथकरघा बुनकर सहकारी सोसायटी हस्तशिल्प उत्पादों पर बिक्रीकर की प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होंगे।
12. स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क की प्रतिपूर्ति
लघु उद्योगों, ग्रामीण और कुटीर उद्योग इकाइयों को अचल क्षेत्रों के बंधक सहित वित्तीय संस्थानों से भूमि और अन्य प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिए स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क के रूप में भुगतान की गई राशि की संपूर्ण प्रतिपूर्ति की जाएगी। यह प्रतिपूर्ति इस शर्त के अध्यधीन होगी कि बंधक रखी गई परिसंपत्तियां 5 वर्षों की अवधि के लिए हस्तांतरित नहीं की जाएंगी।
13. गुणवत्ता नियंत्रण
परीक्षण उपकरणों की खरीद के लिए लघु उद्योग इकाइयों को 25 प्रतिशत सब्सिडी अनुमेय होगी। भारतीय मानक ब्यूरो के साथ पंजीकरण शुल्क और वार्षिक शुल्क आदि की प्रथम 5 वर्षों के लिए पूर्णत: प्रतिपूर्ति की जाएगी। कमज़ोर वर्गों और निर्यातोन्मुख इकाइयों के मामले में 30 प्रतिशत सब्सिडी दी जाएगी।
14. आधुनिकीकरण/विस्तार/विविधिकरण के लिए सब्सिडी
क. संयंत्र और मशीनरी की खरीद के लिए आधुनिकीकरण/ विस्तार/विविधिकरण के लिए 15 प्रतिशत की दर पर एक राज्य पूंजी निवेश सब्सिडी अथवा 1.00 लाख रुपए, जो भी कम हो, अनुमेय होंगे।
ख. वित्तीय संस्थानों से लिए गए ऋण के ब्याज पर 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष अथवा 5 वर्षों की अवधि के लिए 0.80 लाख रुपए प्रतिवर्ष की अधिकतम सीमा तक सब्सिडी अनुमेय होगी।
ग. सरकार द्वारा इस संबंध में गठित और अधिसूचित एक समिति की अनुशंसा पर औद्योगिक इकाई को सब्सिडी दी जाएगी।
मणिपुर सरकार
सचिवालय : वाणिज्य और उद्योग विभाग
अधिसूचना
इम्फाल, 27 नवंबर 1996
संख्या 58/894-आईएनडी. भारत के संविधान के अनुच्छेद 162 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के कार्यान्वयन में, मणिपुर के राज्यपाल इस अधिसूचना के अनुबंध के अनुसार एक औद्योगिक नीति नामत: "मणिपुर की औद्यागिक नीति, 1996" को बनाते और आमेलित करते हैं।
यह नीति 01-01-1995 से प्रभावी होगी।
राज्यपाल के आदेश द्वारा और उनके नाम पर,
चौ. बीरेंद्र सिंह
सचिव (वाणिज्य और उद्योग), मणिपुर सरकार
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