|
|
|
 |
|
राज्य नीति | |
उत्तरांचल औद्योगिक नीति-2001
संकल्पना
निम्नलिखित दृष्टिकोण से उत्तरांचल राज्य के तीव्र और पारिस्थितिकीय रूप से जीवनक्षम औद्योगिक विकास के अनुकूल वातावरण सृजित करना:-
राज्य के औद्योगिक संसाधनों का दोहन करना और उत्पादक कार्यों के लिए उपयोग करना।
उद्योग और आधारभूत संरचनाओं में निवेशों के प्रवाह को बढ़ाना।
अतिरिक्त रोज़गार अवसरों का सृजन करना।
जनता की प्रतिव्यक्ति आय और जीवन स्तर में बढ़ोतरी करना।
राज्य के सभी क्षेत्रों के समान औद्योगिक विकास को सुनिश्चित करना।
उत्तरांचल राज्य को उच्च विकास पथ पर लाना।
सबसे बढ़कर, राज्य में उद्योग-सापेक्ष वातावरण सृजित करने के लिए प्रयास करना जिसमें राज्य सरकार औद्योगिक विकास के लिए एक सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाएगी।
प्रस्तावना
इस प्रलेख में प्रस्तुत की गई औद्योगिक नीति उत्तरांचल राज्य में औद्योगिक विकास के लिए बाधाओं, सुदृढ़ पक्षों और संभावनाओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। नीति में वर्णित रणनीति उत्तरांचल के तीव्र, संतुलित और जीवनक्षम औद्योगिक विकास को लक्षित करती है। राज्य के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों के आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से परंपरागत उद्योगों के पुनर्जीवन और विकास पर विशेष बल दिया गया है। आधारभूत संरचनाओं के विकास, निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी, मानव संसाधन विकास, विपणन सुविधाओं का विस्तार और सबसे बढ़कर पर्यावरण की सुरक्षा को विशेष ध्यान देने योग्य क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास के लिए यह सर्वप्रथम नीति उद्योग संघों, संबंधित सरकारी विभागों और संगठनों तथा जन प्रतिनिधियों की सहभागिता से एक परामर्शी प्रक्रिया का परिणाम है। सबसे बढ़कर, यह नीति राज्य में एक उद्योग-सापेक्ष वातावरण की स्थापना का प्रयास करती है जिसमें राज्य सरकार औद्योगिक विकास में एक सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाती है।
उत्तरांचल, भारत का 27वां राज्य, 9 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। इस नए राज्य के सृजन का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र के तीव्र आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना था। उत्तरांचल के आर्थिक पिछड़ेपन में अनेक कारकों ने योगदान दिया है, जिनमें से एक धीमा औद्योगिक विकास है। इसके कारणों में पर्वतीय और दुर्गम भूप्रदेश, आधारभूत संरचनाओं की कमी, संपर्कों का अभाव, कच्चे माल की उपलब्धता की समस्याएं, बाज़ारों तक सीमित पहुंच और सबसे महत्वपूर्ण, क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए औद्योगिक विकास के लिए एक विशिष्ट नीति का अभाव हैं। इसी संदर्भ में उत्तरांचल राज्य के लिए एक औद्योगिक नीति तैयार की जा रही है।
उत्तरांचल - एक दृष्टि में
क्षेत्र |
54,483 वर्ग किलोमीटर |
कुल जनसंख्या |
84,79,562 |
सघनता 159 प्रति वर्ग किलोमीटर |
|
साक्षरता दर |
72.28 प्रतिशत |
वनाच्छादित क्षेत्र |
64.81 प्रतिशत |
लघु उद्योग 41216
निवेश |
305.58 करोड़ रुपए |
रोज़गार |
1,53,229 |
मध्यम/भारी उद्योग 191
निवेश |
2694.66 करोड़ रुपए |
रोज़गार |
50,802 |
आधारभूत संरचना
विद्युतीकृत गांव |
78.6 प्रतिशत |
पक्की सड़कें |
16,652 किलोमीटर. |
डाकघर |
2695 |
सार्वजनिक टेलीफोन बूथ |
5095 |
टेलीफोन कनेक्शन |
55316 |
सड़क से दूरी के आधार पर गांवों का वितरण |
1 किलोमीटर से कम |
41.51 प्रतिशत |
1 से 3 किलोमीटर |
17.25 प्रतिशत |
3 से 5 किलोमीटर |
13.32 प्रतिशत |
5 किलोमीटर से अधिक |
27.92 प्रतिशत |
संसाधन
प्रमुख वन उत्पाद
अनुमानित उपज स्टॉक |
188.8 हजार घनमीटर |
काष्ठ उत्पादन (1995-96) |
307 हजार घनमीटर (राउंड) |
जलावन लकड़ी उत्पादन (1995-96) |
167 हजार घनमीटर (स्टेक) |
रेज़िन उत्पादन (1999-2000) |
1 लाख क्विंटल |
महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता (मिलियन टन)
खनिज |
मात्रा |
लाइमस्टोन |
430.5 |
संगमरमर |
6.4 |
रॉक फॉस्फेट |
25.0 |
बाराइट्स |
.085 |
ग्रेफाइट | 10.7 |
डोलोमाइट (सुपीरियर) |
30 |
मैग्नेसाइट |
70.294 |
तांबा |
1.6 |
सोप स्टोन |
26.64 |
जिप्सम |
0.195 |
फल और सब्जी उत्पादन
| |
क्षेत्र |
उत्पादन |
उत्पादकता |
| |
(हैक्टेयर में) |
(000 टन) |
(टन/हैक्टेयर) |
फल |
187.53 |
508.20 |
2.71 |
सब्जियां |
69.16 |
387.50 |
5.60 |
आलू |
23.60 |
428.90 |
18.17 |
महत्वपूर्ण वन आधारित उद्योग
रेजिन और टर्पेन्टाइन
कागज
पेंसिल
माचिस की तीली
प्लाइवुड
खेल का सामान, खिलौने, ड्राईंग उपकरण
आयुर्वेदिक और औषधीय पौधे
सुदृढ़ पक्ष
उत्तरांचल को एक स्वच्छ और प्रदूषणमुक्त वातावरण का वरदान प्राप्त है। यहां दुर्लभ औषध वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं। इसकी दो-तिमाही भूमि वनाच्छादित है। अनेक दुर्लभ सुगंधित और औषधीय पौधे राज्य में पाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त, राज्य में अत्यधिक खनिज भंडार हैं। उत्तरांचल पर्यटकों के लिए एक स्वर्ग है और राष्ट्रीय राजधानी से इसकी निकटता इस दृष्टि से एक अतिरिक्त लाभ है। 72 प्रतिशत साक्षरता स्तर के साथ, उत्तरांचल 65 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से काफी आगे है। इसी प्रकार, मानव संसाधन विकास की संभाव्यता भी सुदृढ़ है। अनेक राष्ट्रीय स्तर के तकनीकी और शैक्षिक संस्थान जैसे पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और रूड़की विश्वविद्यालय, राज्य में स्थित हैं। राज्य में हाइड्रो-पावर सृजन के लिए बेहतरीन संभावनाएं हैं। सबसे बढ़कर, राज्य में विद्यमान एक शांतिपूर्ण वातावरण इसे औद्योगिक विकास के अनुकूल बनाता है। निस्संदेह, उत्तरांचल राज्य में तीव्र औद्योगिक विकास और वृद्धि के लिए पूर्वापेक्षाएं मौजूद हैं।
रणनीति
उपरोक्त सुदृढ़ पक्षों और दुर्बलताओं को ध्यान में रखते हुए, उत्तरांचल राज्य में औद्योगिक विकास के लिए निम्नलिखित रणनीति तैयार की गई है:
जहां संभव और व्यावहारिक हो, निजी क्षेत्र की भागीदारी से सड़क, विद्युत, जल आपूर्ति, संचार आदि क्रांतिक संरचनात्मक सुविधाओं का विकास करना।.
स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल और कौशलों पर आधारित विशेष उद्योगों में संवेगी क्षेत्रों को चिह्नित करना और ऐसे प्रत्येक क्षेत्र के लिए एकीकृत विकास योजनाएं तैयार करना।
विदेशी और अनिवासी भारतीयों से निवेश आकर्षित करने सहित निजी क्षेत्र की सहभागिता को प्रोत्साहित करना।
विपणन सुविधाओं को सुदृढ़ और विस्तृत करना।
पर्यावरण की सुरक्षा को सुनिश्चित करना।
कृषि/बागवानी, पर्यटन, वन, पर्यावरण आदि जैसे सभी संबंधित विभागों में तालमेल विकसित करना।
मानव संसाधनों का विकास करना।
सभी स्तरों पर मित्रतापूर्ण, उत्तरदायी और सक्रिय प्रशासन के माध्यम से उपरोक्त रणनीति के कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त संस्थागत व्यवस्थाएं प्रदान करना।
संरचनात्मक सुविधाओं का विकास
तीव्र औद्योगिक विकास और वृद्धि के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूर्वापेक्षा अत्याधुनिक संरचनाओं का सृजन है।
अन्य प्रमुख केंद्रों और बाज़ारों के साथ राज्य के संपर्कों को उन्नत करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा। भारत सरकार के परामर्श से राज्य से आवागमन के लिए रेल और वायु सेवाओं के विकास के लिए एक एकीकृत योजना तैयार की जाएगी। भूतल परिवहन मंत्रालय, भारत सरकार और सीमा सड़क संगठन के सहयोग से, राज्य में बेहतर गुणवत्तापूर्ण सड़कों का नेटवर्क बनाया जाएगा। देहरादून और नैनीताल के बीच एक एक्सप्रेस राजमार्ग के निर्माण के प्रयास किए जाएंगे।
केंद्रीय नागर विमानन मंत्रालय के सहयोग से, राज्य जॉली ग्रांट (देहरादून), पंतनगर (उधमसिंहनगर), गोचर (चमोली), चिनयालीसौर (उत्तरकाशी) और पिथौरागढ़ में विद्यमान हवाई अड्डों/हवाई पट्टियों की सुविधाओं के उन्नयन के प्रयास करेगा। इन हवाई पट्टियों को एक समयबद्ध तरीके से संचलनात्मक बनाने के लिए कार्रवाई की जाएगी और इस प्रक्रिया में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाएगा।
निजी क्षेत्र की अधिकतम संभव भागीदारी के साथ राज्य में संचार नेटवर्क और सूचना प्रौद्योगिकी संरचनाओं के उन्नयन के लिए विशेष प्रयास भी किए जाएंगे।
औद्योगिक विकास के लिए अन्य प्रमुख कारक अच्छी गुणवत्तापूर्ण, अबाधित विद्युत आपूर्ति को सुनिश्चित करना है। उत्तरांचल में विद्युत उत्पादन के लिए व्यापक संभावनाएं हैं जिनका दोहन नहीं किया गया है। लघु, अति लघु और माइक्रो हाइडल परियोजनाओं सहित हाइड्रो-पावर परियोजनाओं को प्रगतिशील रूप में विकासित और संचालित करने के लिए प्रयास किए जाएंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की जाएगी कि उत्तरांचल को विद्युत के केंद्रीय पूल से उसका हिस्सा प्राप्त हो। आवश्यक होने पर टिहरी बांध परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ यह आशा की जाती है कि आगामी 2-3 वर्षों में राज्य में विद्युत की स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार होगा और हम राज्य में उद्योगों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण, अबाधित विद्युत आपूर्ति करने में सक्षम हो जाएंगे।
विद्यमान औद्योगिक क्षेत्रों के संरचनात्मक ढांचे को उन्नत और सुदृढ़ किया जाएगा। विद्युत, पानी, सड़कें, संचार और स्वच्छता सुविधाओं को उन्नत किया जाएगा।
बड़े औद्योगिक क्षेत्रों/बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं की विशिष्ट संरचनात्मक आवश्यकताओं के लिए विशेष संस्थागत तंत्र और निधियों का विकास करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। इस संबंध में संरचना विकास वित्त कंपनी (आईडीएफसी) के साथ पहले ही समझौता-ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं और निजी क्षेत्र की अधिकतम सहभागिता के साथ संरचना विकास के लिए उनके साथ एक संयुक्त उद्यम स्थापित करने का भी प्रस्ताव किया गया है।
ग्रामीण/पिछड़े क्षेत्रों में लघु उद्योगों के लिए भारत सरकार की एकीकृत संरचनात्मक विकास योजना (प्रौद्योगिकीय बैकअप सहित) को रोज़गार अवसरों के सृजन और निर्यातों के विकास, कृषि और उद्योगों के मध्य सुदृढ़ संपर्कों के संवर्धन, चयनित क्षेत्रों में सामान्य सेवा सुविधाओं और बैकअप सेवाओं को प्रदान करने तथा विद्यमान/नए केंद्रों में विद्युत, पानी, संचार जैसी संरचनात्मक सुविधाओं का सृजन/उन्नयन करने के उद्देश्य से कार्यान्वित किया जाएगा।
संवेगी क्षेत्रों का चिह्नांकन
उत्तरांचल के लिए औद्योगिक संवेगी क्षेत्रों को परंपरागत और अन्य उद्योगों में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है।
परंपरागत उद्योग
राज्य सरकार निजी क्षेत्र की सहभागिता के साथ क्लस्टर अभिगम के माध्यम से परंपरागत उद्योगों के विकास के लिए प्रयास करेगी। इन क्लस्टरों में गुणवत्ता उन्नयन, प्रौद्योगिकी और डिज़ाइन उन्नयन, विपणन संवर्धन और कौशल संवर्धन के लिए सामान्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। इन क्लस्टरों को प्रचलित केंद्रीय और राज्य प्रायोजित योजनाओं/कार्यक्रमों के साथ उपयुक्त संपर्क स्थापित करके सहायता प्रदान की जाएगी।
विशेष रूप से राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत उद्योगों के पुनर्जीवन और विकास के लिए एक मास्टर प्लान तैयार किया जाएगा। यह मास्टर प्लान इन परंपरागत उद्योगों के विकास के लिए अग्रगामी और पश्चगामी संपर्कों अर्थात् कच्चे माल की उपलब्धता, दस्तकारों का प्रशिक्षण, नए बाज़ारों का चिह्नांकन आदि की स्थापना पर विशेष बल देगा।
हस्तशिल्प : उत्तरांचल में अनेक हस्तशिल्प उद्योग हैं उदाहरणार्थ कालीन बुनाई, काष्ठ पच्चीकारी, पीतल के बर्तन और तांबा आधारित उद्योग जो निष्क्रिय पड़े रहे हैं। इन उद्योगों के पुनर्जीवन के लिए, सरकार पर्याप्त अग्रगामी और पश्चगामी संपर्कों को सुनिश्चित करने में एक सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाएगी। इसके साथ-साथ मास्टर शिल्पकारों से प्रशिक्षण का आयोजन किया जाएगा और इन स्थानों को "शिल्प ग्रामों" के रूप में विकसित किया जाएगा। हस्तशिल्प उत्पादों के विपणन के लिए, पर्यटन केंद्रों में दुकानें विकसित करने हेतु कार्रवाई की जाएगी और राज्य के बाहर के बाज़ारों में अधिकतम पहुंच प्रदान की जाएगी। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार की "बाबा साहेब अम्बेडकर हस्तशिल्प विकास योजना" से भी सहायता प्राप्त की जाएगी जिसका लक्ष्य एकीकृत क्लस्टर अभिगम के माध्यम से और शिल्पकारों को स्वयं-सक्षम बनाकर हस्तशिल्प क्षेत्र का विकास करना है।
हथकरघा : ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार सृजन के लिए इस उद्योग का व्यापक महत्व है। दीनदयाल हथकरघा प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत सहकारी समितियों अथवा पंजीकृत समूहों को लाभ प्रदान करने के लिए कार्रवाई की जाएगी। इन समूहों के सदस्यों को आधुनिक करघे और डिज़ाइन प्रदान करने के साथ-साथ प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाएगा। उनके उत्पादों के विपणन की सुगमता के लिए कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार एकीकृत हथकरघा कॉम्पलेक्सों के विकास का भी प्रस्ताव करती है जहां डाइंग, कार्डिंग, डिज़ाइनों के विकास आदि के लिए सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
काष्ठ आधारित उद्योग : जनसंख्या का एक बड़ा भाग भेड़-पालन और ऊन उत्पादन में लगा है। यद्यपि, ऊन उद्योग एक एकीकृत रूप में विकसित नहीं हुआ है। इस उद्योग के विकास के लिए अच्छी गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता, ऊन प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, गुणवत्ता और डिज़ाइन उन्नयन, विपणन प्रबंधों की सुदृढ़ता और संस्थागत वित्त के संचलन पर विशेष बल देने का प्रस्ताव किया जाता है। गैर-परंपरागत पशु ऊन धागों को भी प्रोत्साहित और विकसित किया जाएगा। इसी प्रकार वानस्पातिक धागों के विकास के लिए भी प्रयास किए जाएंगे। एक ऊन बैंक और ऊन नीलामी यार्डों की भी स्थापना की जाएगी।
खादी और ग्रामोद्योग : खादी और ग्रामोद्योगों, कुटीर उद्योगों तथा अति लघु उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया जाएगा। पैकेजिंग और विपणन के लिए सामान्य सुविधा केंद्रों को विकसित किया जाएगा। राज्य सरकार के प्रयासों को देखते हुए, भारत सरकार ने "घरातों" को एक कुटीर उद्योग घोषित कर दिया है। ये "घरात" ग्रामीण क्षेत्रों में अति लघु उद्योगों के विकास के लिए एक धुरी के रूप में कार्य करेंगे।
मोम आधारित उद्योग : यह राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण हस्तशिल्प उद्योग है। अच्छी गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता का अभाव इस उद्योग के समक्ष मुख्य समस्या है। इस समस्या से निपटने के लिए संस्थागत प्रबंध किए जाएंगे। तैयार उत्पादों के विपणन के लिए उपयुक्त व्यवस्था को भी प्राथमिकता प्रदान की जाएगी।
जैव-प्रौद्योगिकी : सूचना प्रौद्योगिकी के बाद, जैव प्रौद्योगिकी वैश्विक स्तर पर उभरता हुआ संवेगी क्षेत्र है। उत्तरांचल अपनी औषध वनस्पति और जीव-जंतुओं की व्यापक विविधता के लिए प्रसिद्ध है। राज्य की दो-तिहाई भूमि वनाच्छादित है। पौधों और जंतुओं की दुर्लभ प्रजातियां भी राज्य में पाई जाती हैं। इस संदर्भ में, खाद्य और कृषि क्षेत्रों में अनुसंधान के दायरे में संयुक्त अभिनवों के लिए रणनीतिक सहयोग बनाने के क्रम में रैबो इंडिया फाइनैंस कंपनी, संरचना विकास वित्त कंपनी और जी.बी. पंत कृषि विश्वविद्यालय के साथ पहले ही एक समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। एक जैव-प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना के लिए भी प्रयास किए जाएंगे।
कृषि आधारित और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग : उत्तरांचल अन्न, फलों, सब्जियों और मसालों की बड़ी विविधताओं का उत्पादन करता है। ऐसे उत्पादों की बहुत बड़ी मात्रा भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं के अभाव में बेकार हो जाती है। पैकेजिंग उद्योग की भी यहां बहुत आवश्यकता है। इस क्षेत्र के विकास और सुदृढ़ीकरण के लिए, निजी क्षेत्र के सहयोग और राज्य तथा केंद्रीय सरकार के सभी संबंधित विभागों और एजेंसियों के समन्वय से अग्रगामी और पश्चगामी संपर्क स्थापित किए जाएंगे।
क. राज्य सरकार लघु और मध्यम आकार के कृषि पार्कों की स्थापना में सहायता प्रदान करेगी जो भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन के लिए सामान्य संरचनात्मक सुविधाएं प्रदान करेंगे और इस प्रकार वर्तमान समय की तरह फल और सब्जियां बेकार नहीं जाएंगे।
ख. फल और सब्जी आधारित शराब के कारखानों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाएगा।
ग. कृषि आधारित निर्यात के लिए एक कृषि निर्यात क्षेत्र विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।
घ. टिकाऊ, आकर्षक और पर्यावरण-सापेक्ष पैकेजिंग सामग्री के उत्पादन के उद्देश्य के साथ राज्य में पैकेजिंग उद्योग के आधुनिकीकरण के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे।
ङ. फलों और सब्जियों को बेकार होने से बचाने के लिए, फसल-पश्चात् प्रबंध संरचनाओं का विकास और शीत श्रृंखलाओं सहित बागवानी उत्पादों के विपणन के लिए एक एकीकृत नेटवर्क उत्पन्न करने के लिए कार्रवाई की जाएगी।
च. राज्य सरकार उच्च गुणवत्तापूर्ण बागवानी फार्मों के विकास में सहायता प्रदान करेगी जो नवीनतम प्रौद्योगिकी और तकनीकों के साथ वाणिज्यिक बागवानी का विकास करने हेतु हॅब के रूप में कार्य करेंगे।
पुष्पोत्पादन: उत्तरांचल में फूलों की दुर्लभ विविधताएं और फूलों के वाणिज्यिक उत्पादन के अनुकूल बेहतरीन पर्यावरणीय परिस्थितियां विद्यमान हैं। कुछ लोकप्रिय किस्में हैं गुलाब, लिलियम, कैला-लिलि, फ्रेज़िया और ग्लैडुलाई। छंटाई, ग्रेडिंग, प्री-कूलिंग, शीत भंडार, प्रसंस्करण, पैकिंग और विपणन सुविधाओं के लिए सामान्य संरचनात्मक सुविधाओं के साथ एक पुष्पोत्पादन पार्क की स्थापना का प्रस्ताव किया जाता है। इस संबंध में, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा), राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय आदि जैसे संस्थानों का सहयोग प्राप्त करने के प्रयास किए जाएंगे।
आयुर्वेदिक और औषधीय पौधों पर आधारित उद्योग : उत्तरांचल में आयुर्वेदिक, औषधीय और सुगंधित पौधों की प्रजातियों की बहुत किस्में हैं। वाणिज्यिक उत्पादन और प्रसंस्करण तथा विपणन के लिए एकीकृत प्रबंध के लिए एक सुव्यवस्थित और समन्वित रणनीति के अभाव में इस जबरदस्त संभावना का अधिकतर दोहन नहीं किया गया है। इस उद्देश्य के लिए भारत सरकार और पूरे देश की विशेषज्ञ एजेंसियों के सहयोग से एक एकीकृत कार्य योजना तैयार की जाएगी। इस उद्योग और पर्यटन के मध्य भी रणनीतिक संपर्क बनाए जाएंगे। देश और विदेशों दोनों में विपणन के लिए प्रबंध पर विशेष बल दिया जाएगा।
चाय उद्योग : हाल ही में, बड़ी संख्या में लघु और सीमांत किसानों तथा भूमिहीन श्रमिकों को शामिल करते हुए राज्य में चाय की पौधरोपण में महत्वपूर्ण विस्तार करने के लिए सघन प्रयास प्रारंभ किए गए हैं। पहले ही नई पौधरोपण के 560 एकड़ को कवर किया जा चुका है और अगले कुछ वर्षों में चाय पौधरोपण के अंतर्गत 22000 एकड़ अतिरिक्त भूमि को शामिल करने का प्रस्ताव है। चाय प्रसंस्करण और पैकेजिंग इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहन देने और इस प्रकार उत्तरांचल को देश के एक प्रमुख चाय उत्पादक के रूप में स्थापित करने के लिए कार्रवाई की जाएगी।
• वन आधारित उद्योग : उत्तरांचल में वनों की व्यापक उपस्थिति के कारण, पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखने और वन संरक्षण तथा पर्यावरण सुरक्षा से संबंधित कानूनों के पालन पर पूरा ध्यान देते हुए, राज्य में वन संसाधनों पर आधारित उद्योग के विकास के लिए बेहतरीन संभावनाएं हैं। ऐसे कुछ उद्योगों में कागज़ और कागज़ उत्पाद, प्लाईवुड/फ्लश बोर्ड, फर्नीचर, काष्ठ पच्चीकारी, खेलों का सामान, खिलौने, शैक्षिक सहायक उपकरण (विशेषकर पेंसिल), माचिस की तीलियां, कत्था, बांस आधारित उत्पाद आदि को सम्मिलित किया जा सकता है।
इसके साथ-साथ, लैनटाना, पाइन-नीडल्स और वानस्पतिक फाइबर जैसे रामबांस आदि वन और कृषि अपशिष्टों पर आधारित उद्योगों के विकास के लिए व्यापक संभावना है। ऐसी सामग्रियों पर आधारित उद्योगों अनुसंधान और विकास, उत्पाद विकास और संवर्धन के लिए एक एकीकृत रूप में और विशेषज्ञ एजेंसियों के सहयोग से कार्रवाई की जाएगी।
सूचना प्रौद्योगिकी : वनाधारित उद्योग : अपने स्वच्छ पर्यावरण, राष्ट्रीय राजधानी से निकटता, उच्च साक्षरता दर, विशेषकर देहरादून, नैनीताल, रुड़की और उधमसिंहनगर (पंतनगर) में उच्च गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक संस्थानों की बहुलता, और बहुसंख्या में राष्ट्रीय संस्थानों की मौजूदगी के साथ, उत्तरांचल में देश में सूचना प्रौद्योगिकी के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित होने की संभावनाएं हैं। इस दृष्टिकोण तथा पर्वतीय भूप्रदेश के बड़े क्षेत्र और बिखरी हुई बस्तियों के कारण, सूचना प्रौद्योगिकी को राज्य में विकास के प्रमुख संवेगी क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया है।
सूचना प्रौद्योगिकी नीति सूचना प्रौद्योगिकी बैकबोन/आधारभूत संरचना की स्थापना के चार प्रमुख क्षेत्रों सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षा और शिक्षा में सूचना प्रौद्योगिकी, शासकीय कार्यों, पर्यटन, वाणिज्य और व्यवसाय में सूचना प्रौद्योगिकी, और हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर विकास के माध्यम से सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग पर केंद्रित है। इन सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश के व्यापक अवसर होंगे तथा सरकार इसके प्रोत्साहन और संवर्धन के लिए विशेष प्रयास करेगी।
यह अनुमान लगाया गया है कि 2010 तक अकेले सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाएं ही एक लाख लोगों के लिए रोज़गार अवसर उत्पन्न कर सकती हैं। इसी प्रकार, यह अनुमान लगाया गया है कि उसी अवधि के दौरान 20,000 करोड़ रुपए के सॉफ्टवेयर निर्यात और घरेलू विपणन की संभावना है। इस प्रकार बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय वेतन आधारित और स्वरोज़गार तथा आय सृजन के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में बड़े खिलाड़ियों के लिए काफी गुंजाइश है।
सरकार उद्योग संघों और नैसकॉम जैसे विशेषज्ञ संगठनों जो उत्तरांचल के लिए एक सूचना प्रौद्योगिकी संकल्पना का विकास कर रहे हैं, के सहयोग से उपरोक्त सभी क्षेत्रों में सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के संवर्धन के लिए योजनाबद्ध पहल करेगी। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के साथ सूचना प्रौद्योगिकी विकास के लिए एक संयुक्त कार्यदल की भी स्थापना की जा चुकी है।
राज्य में विभिन्न स्थानों पर सॉफ्टवेयर टैक्नॉलॉजी पार्कों (एसटीपी) की स्थापना के लिए कार्रवाई की जाएगी और देहरादून में एक एसटीपी/आईटीपी (सूचना प्रौद्योगिकी पार्क) की स्थापना के लिए कार्य प्रारंभ हो गया है। सॉफ्टवेयर टैक्नॉलॉजी पार्क ऑफ इंडिया (एसटीपीआई) के साथ एक समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं जिसके अंतर्गत एक अर्थ स्टेशन की स्थापना का कार्य लगभग पूरा होने वाला है।
एसटीपी/आईटीपी की स्थापना के साथ बहुत शीघ्र उत्तरांचल में, यथासंभव, एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी) की स्थापना के लिए कार्रवाई की जाएगी।
मनोविनोद और मनोरंजन उद्योग :
उत्तरांचल पर्यटन के साथ मनोविनोद और मनोरंजन उद्योग के विकास के लिए बेहतरीन अवसर प्रदान करता है। राज्य में प्राकृतिक और दृश्यव्य सौंदर्य के बहुसंख्य स्थल हैं। निजी क्षेत्र की सहभागिता और निवेश के साथ मनोरंजन पार्कों, जंगल सफारी, बोटेनिकल पार्कों, नेचर पार्कों आदि की स्थापना के लिए कार्रवाई की जाएगी।
उत्तरांचल में फिल्मों की शूटिंग के लिए बेहतरीन स्थल हैं। फिल्मोद्योग के करीबी सहयोग से, सभी अन्य तकनीकी उपकरणों के साथ फिल्मों की प्रिंटिंग, डबिंग और एडिटिंग के लिए आधारभूत संरचनाएं और सुविधाएं प्रदान करने के क्रम में एक "फिल्म सिटी" विकसित करने के लिए कार्रवाई की जाएगी।
निजी क्षेत्र की सहभागिता और निवेश :
औद्योगिक विकास के लिए प्रमुख तत्वों में से एक उद्योग में निवेशों और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का समावेश है। सरकार द्वारा एक सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाने के साथ उद्योग में निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के लिए कार्रवाई की जाएगी। औद्योगिक अनुमोदनों के लिए प्रक्रियाओं का सरलीकरण किया जाएगा और एकल खिड़की प्रणाली प्रारंभ की जाएगी ताकि निजी क्षेत्र की भागीदारी बोझिल नियमों और विनियमों से अबाधित रहे। विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए, निवेश और प्रौद्योगिकी मार्ट (इनटैकमार्ट्स) को संगठित किया जाएगा जिनमें विशिष्ट औद्योगिक परियोजनाओं को विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए रखा जाएगा। अनिवासी भारतीयों से निवेशों के संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे। प्रक्रिया की सुगमता के लिए शीर्ष उद्योग संघों, निजी क्षेत्र के औद्योगिक घरानों और यूएनडीपी, यूनीडो आदि जैसे संयुक्त राष्ट्र संगठनों का सहयोग लिया जाएगा।
मानव संसाधन विकास :
महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों, बेरोज़गार युवाओं और समाज के अन्य कमज़ोर वर्गों में उद्यमिता के विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए राज्य में उद्यमिता के विकास पर विशेष बल दिया जाएगा। परंपरागत और अन्य उद्योगों में कार्यरत व्यक्तियों के प्रबंध कौशल के विकास की दृष्टि से भारतीय प्रबंध संस्थान, उद्यमिता विकास संस्थान आदि जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों से संपर्क स्थापित किए जाएंगे।
विपणन सुविधाएं :
राज्य में विपणन सुविधाओं को सुदृढ़ बनाने की अनिवार्य आवश्यकता है। व्यापार मेलों, क्रेता-विक्रेता सम्मेलनों, निवेश और प्रौद्योगिकी मार्ट आदि के आयोजन पर विशेष बल दिया जाएगा। एक उत्तरांचल हाट भी स्थापित की जाएगी। भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन, प्रगति मैदान, नई दिल्ली में एक राज्य पवेलियन स्थापित किया जाएगा। उत्तरांचल के औद्योगिक उत्पादों पर अद्यतन सूचना और अन्य उद्योगों से संबंधित सूचना को प्रदर्शित करने वाली एक वेबसाइट प्रारंभ की जाएगी। औद्योगिक उत्पादों, विशेषकर हस्तशिल्प, के लिए प्रदर्शन/बिक्री केंद्रों को विकसित किया जाएगा।
पर्यावरण की सुरक्षा :
पर्यावरण सुरक्षा और पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। औद्योगिक इकाइयों को बहि:स्रावी उपचार संयंत्रों की स्थापना, ठोस अपशिष्ट निपटान के लिए स्थलों को विकसित करने, स्वच्छ उत्पादन केंद्रों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर कठोर सजा दी जाएगी।
उद्योग मित्र :
सरकार का संवेग राज्य में उद्योगों की उन्नति और विकास के लिए एक मित्रतापूर्ण वातावरण उत्पन्न करना है। इस उद्देश्य के साथ, सरकार राज्य स्तर पर एक उद्योग मित्र की स्थापना करेगी। इसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे और उद्योग मंत्री तथा अन्य सभी संबंधित मंत्री इसके सदस्य होंगे। उद्योग संघों के प्रतिनिधियों के साथ मुख्य सचिव और सभी संबंधित विभागों के सचिव इसके सदस्य होंगे। उद्योग मित्र सरकार और उद्योगों के मध्य एक परामर्शी तंत्र के रूप में कार्य करेगा और इसका उद्देश्य राज्य में एक उद्योग सापेक्ष वातावरण सृजित करना और कार्रवाई तथा नीति आवश्यकताओं के संबंध में निरंतर समीक्षा तथा निर्णय लेना होगा। उद्योग मित्र रुग्ण उद्योगों और उनके पुनर्वास से संबंधित मामलों को भी देखेगा।
जिला स्तर पर, उद्योग मित्र उद्योगों से संबंधित सभी मामलों में प्रभावी क्षेत्र स्तरीय एकीकरण, समीक्षा और निगरानी के लिए जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में कार्य करेगा।
औद्योगिक विकास बोर्ड (आईडीबी):
राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक औद्योगिक विकास बोर्ड स्थापित किया जाएगा। यह समीक्षा और नीति संबंधी पहल करेगा तथा प्रमुख परियोजनाओं के संबंध में अनुमतियों के लिए एक एकल खिड़की मंच प्रदान करेगा। इसमें नागर विमानन, पर्यावरण और वन, वित्त, गृह, सूचना प्रौद्योगिकी, श्रम, विद्युत, लोक निर्माण और परिवहन विभागों के प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे।
अन्य उपाय:
राज्य में विभिन्न प्रकार के उद्योगों के संवर्धन और विकास के लिए नीति तथा कार्य आवश्यकताओं से संबंधित मामलों पर सरकार को परामर्श देने के लिए राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों और प्रमुख उद्योग संघों के प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों वाली एक परिषद् स्थापित की जाएगी।
उपायों और कार्य आवश्यकताओं के चिह्नांकन को सक्षम बनाने के लिए राज्य में संचालित विभिन्न उद्योगों की स्थिति और समस्याओं का अध्ययन तथा समीक्षा की जाएगी।
रुग्ण उद्योगों के पुनर्वास पर विशेष बल दिया जाएगा।
राज्य सरकार सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, इलैक्ट्रॉनिक्स आदि जैसे उच्च प्रौद्योगिकी वाले क्षेत्रों में बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा प्रौद्योगिकी संस्थाओं/संस्थानों की स्थापना को भी प्रोत्साहित करेगी।
औद्योगिक गतिविधियों के भाग के रूप में सेवा क्षेत्र को पूरा प्रोत्साहन दिया जाएगा। सरकार से यथासंभव सहायता के साथ तकनीकी परामर्श, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी गतिविधियों, निर्माण आदि जैसी गतिविधियों में स्वसहायता समूहों की स्थापना के लिए शिक्षित बेरोज़गार युवाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रोत्साहन :
विद्युत:
तीव्र औद्योगिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए, औद्योगिक इकाइयों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण, अबाधित विद्युत आपूर्ति एक सर्वाधिक कठिन कारक है। इस संबंध में, निम्नलिखित निर्णय किए गए हैं:
कृषि आधारित और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को एक उछाल देने के लिए, एक विशेष शुल्क (सामान्य औद्योगिक शुल्क से कम) प्रारंभ किया जाएगा।
जैसे ही राज्य सरकार विद्युत के केंद्रीय पूल से अपना आवंटन प्राप्त करेगी, लघु और मध्यम उद्योगों पर व्यस्त घंटों की रोक (100 एचपी पॉवरलोड के आधार पर परिभाषित) को हटाने पर विचार किया जाएगा।
टिहरी बांध परियोजना के संचालित होने के साथ ही भारी उद्योगों सहित सभी उद्योगों के लिए व्यस्त घंटों की रोक को हटाना प्रस्तावित है।
औद्योगिक लोड के 75 प्रतिशत अथवा अधिक के साथ फीडरों को तत्काल प्रभाव से अबाधित विद्युत आपूर्ति प्रदान की जाएगी।
11 केवीए, 33 केवी/66 केवी और 132 केवी की लोड स्वीकृति के लिए समय-सीमा और प्रणाली निम्नलिखित होगी:-
11 केवीए लाइन की लोड स्वीकृति
30 दिनों के भीतर लोड की स्वीकृति।
मांग पत्र और स्वीकृति जारी करने के लिए अतिरिक्त 30 दिन।
मांग पत्र के पूरा होने की तिथि से कनेक्शन की रिलीज - 60 दिन।
33 केवी/66 केवी लाइन
स्वीकृति और लोड तथा मांग पत्र जारी करने के लिए 60 दिन।
संभाव्यता रिपोर्ट जारी करना - 45 दिन
मांग पत्र के पूरा होने के बाद कनेक्शन की रिलीज - 90 दिन।
132 केवी और अधिक
यह स्वीकृति सरकार के स्तर पर उद्योग विभाग के साथ परामर्श पर प्रदान की जाएगी।
वित्तीय :
चयनित आधार पर लघु और मध्यम उद्योगों के लिए केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) को 4 प्रतिशत से घटाकर 1 प्रतिशत किया जाएगा।
वित्तीय संस्थानों से लघु उद्योग इकाइयों द्वारा लिए गए ऋणों के ब्याज की दर पर 2.00 लाख रुपए प्रति इकाई की सीमा के अधीन 2 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाएगी।
भारत सरकार की परिवहन सब्सिडी योजना के अंतर्गत, राज्य सरकार द्वारा निर्णित दरों अथवा भुगतान किए गए वास्तविक किराए, जो भी कम हो, के आधार पर उत्पादन की तिथि से 5 वर्षों तक सब्सिडी के रूप में परिवहन लागत का 50 प्रतिशत प्रदान किया जाएगा।
संरचनात्मक परियोजनाओं में इक्विटी/वित्तीय भागीदारी के माध्यम से सहायता पर विचार किया जाएगा और हरेक मामले के आधार पर इसे प्रदान किया जाएगा।
अन्य उपाय :
गुणवत्ता से समझौता किए बिना, राज्य की लघु उद्योग इकाइयों द्वारा निर्मित मदों को सरकारी खरीद में खरीद वरीयता प्रदान की जाएगी।
राज्य सरकार राज्य में उद्योगों के विकास के लिए भूमि संबंधी चिह्नांकन, स्थानांतरण, अधिग्रहण/विक्रय और अन्य मामलों के लिए सुविधाप्रदाता के रूप में कार्य करेगी। इस उद्देश्य के लिए, उद्योग निदेशालय और जिला उद्योग केंद्रों के कार्यालयों में एक विशेष कक्ष की स्थापना की जाएगी।
गुणवत्ता आश्वासन को प्रोत्साहन दिया जाएगा और अनुमोदित संस्थानों/अनुसंधान प्रयोगशालाओं से गुणवत्ता प्रमाणन प्राप्त करने वाली औद्योगिक इकाइयों को व्यय के 50 प्रतिशत (अधिकतम 1.00 लाख रुपए) तक सहायता प्रदान की जाएगी।
आईएसओ-9000 प्रमाणन प्राप्त करने वाली इकाइयों को दसवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि के दौरान 75,000 रुपए प्रति इकाई सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
औद्योगिक इकाइयों जो अपने पेटेंट पंजीकृत कराती हैं, को किए गए व्यय के 75 प्रतिशत (अधिकतम 2.00 लाख रुपए) तक सहायता प्रदान की जाएगी।
राज्य सरकार श्रम कानूनों और प्रक्रियाओं को तर्कसंगत बनाने तथा सरलीकरण के लिए एक प्रक्रिया प्रारंभ करेगी।
प्रताड़ना को रोकने के लिए निरीक्षणों की विद्यमान प्रणाली को तर्कसंगत बनाने हेतु ठोस कदम उठाए जाएंगे।
राज्य सरकार भारत सरकार के साथ मिलकर कुछ विशेष श्रेणी वाले राज्यों की भांति औद्योगिक विकास के लिए एक विशेष पैकेज प्राप्त करने का प्रयास करेगी जिसमें आयकर अवकाश, केंद्रीय उत्पाद-शुल्क में छूट और पूंजी निवेश सब्सिडी आदि सम्मिलित हो सकते हैं।
उपरोक्त रणनीति से आशा की जाती है कि यह उत्तरांचल राज्य के तीव्र, संतुलित और जीवनक्षम औद्योगिक विकास को सुनिश्चित करेगी।
उद्योग संबंधी सूचना के लिए महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु
उद्योग मंत्री का कार्यालय
विधान भवन, हरिद्वार रोड, देहरादून
दूरभाष: 91-0135-677499 फैक्स: 91-0135-677222
मुख्य सचिव
उत्तरांचल सरकार, देहरादून
दूरभाष: 91-0135-712100 फैक्स : 91-0135-712500
सचिव एवं उद्योग निदेशक
उत्तरांचल सरकार, देहरादून
दूरभाष: 91-0135-712095 फैक्स: 91-0135-712112
ई-मेल : nareshnp@sancharnet.in
उद्योग निदेशालय
उत्तरांचल सरकार, देहरादून
टेलीफैक्स: 91-0135-742903
जिला उद्योग केंद्र, देहरादून
टेलीफैक्स: 91-0135-724903
जिला उद्योग केंद्र, कोटद्वार (पौड़ी)
टेलीफैक्स: 91-01382-22266
जिला उद्योग केंद्र, गोपेश्वर (चमोली)
टेलीफैक्स: 91-01372-52126
जिला उद्योग केंद्र, नरेन्द्र नगर (टिहरी)
टेलीफैक्स: 91-01378-27297
टेलीफैक्स: 91-01374-22744
जिला उद्योग केंद्र, रुड़की (हरिद्वार)
टेलीफैक्स: 91-01332-62452
जिला उद्योग केंद्र, उधमसिंह नगर
टेलीफैक्स: 91-05944-43204
जिला उद्योग केंद्र, हल्द्वानी (नैनीताल)
टेलीफैक्स: 91-059-20669
जिला उद्योग केंद्र, अल्मोड़ा
टेलीफैक्स: 91-05962-30177
जिला उद्योग केंद्र, पिथौरागढ़
टेलीफैक्स: 91-05964-22574
कुमाऊं गढ़वाल वाणिज्य और उद्योग चैंबर, काशीपुर (उधमसिंह नगर)
दूरभाष: 91-05947-75178 फैक्स: 91-05947-79078
भारतीय उद्योग संघ, उत्तरांचल, देहरादून
दूरभाष: 91-0135-640530 फैक्स: 91-0135-642640
उत्तरांचल उद्योग संघ, देहरादून
दूरभाष: 91-0135-725287, 726850, 652624 फैक्स: 91-0135-721308
|