ऋण - व्यापार की जीवन रेखा
व्यापर से संबंधित सभी तत्वों में संभवत: ऋण ही सर्वाधिक कठिन है। यदि सही समय पर पर्याप्त वित्त उपलब्ध न हो तो सर्वोत्तम योजनाएं भी निष्फल चली जाती हैं। लघु उद्योगों को न केवल उद्यम को चलाए रखने और उसकी परिचालन संबंधी आवश्यकताओं के लिए ही, अपितु सुविधाओं के विविधीकरण, आधुनिकीकरण/उन्नयन, क्षमता, विस्तार आदि के लिए भी ऋण समर्थन की आवश्यकता है। लघु उद्योगों के संबंध में, जब भी कोई बड़ी घटना जैसे बड़ा ऑर्डर मिलना, कन्साइनमेंट रद्द होना, भुगतान में असामान्य विलम्ब आदि, होती है तो ऋण की समस्या और भी अधिक गंभीर हो जाती है। सामान्यत: लघु उद्योग बहुत कम बजट में ही काम करते हैं और प्राय: स्वामी द्वारा अपने अंशदान, मित्रों और संबंधियों से और कुछ बैंक ऋणों द्वारा ही वित्तपोषित किए जाते हैं।
भारत सरकार ने लघु उद्योगों के संवर्धन के प्रारंभिक समय में ही लघु उद्योगों के लिए विशेष रूप से ऋण नीति बनाने की आवश्यकता को पहचान लिया था। इसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित घटकों के साथ ऋण नीति तैयार की गई :-
प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण : लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण देना बैंकों द्वारा प्राथमिक क्षेत्र के ऋण के भाग के रूप में सुनिश्चित किया जाता है। बैंकों से अनिवार्य रूप से यह सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है कि वे सरकार द्वारा वर्गीकृत प्राथमिकता क्षेत्र को अपने संपूर्ण ऋणों का परिभाषित प्रतिशत (वर्तमान में 40 प्रतिशत) प्रदान करें। इन क्षेत्रों में कृषि, लघु उद्योग, निर्यात आदि सम्मिलित हैं। इस सूची में लघु उद्योगों को शामिल करने से वे इस चिह्नित ऋण के पात्र बन जाते हैं।
संस्थागत व्यवस्था : भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्थापना शीर्षस्थ पुनर्वित्त बैंक के रूप में की गई है। राज्य वित्त निगम और अनुसूचित बैंकों द्वारा आवधिक ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं। नाबार्ड, राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम आदि द्वारा भी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप में कुछ हद तक ऋण की आपूर्ति की जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ ही लघु उद्योगों की ऋण आवश्यकताओं की पूर्ति पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है। निम्नलिखित उठाए गए कदमों से इसे स्पष्ट किया गया है :-
- लघु उद्योगों को दिए जाने वाले सम्पूर्ण ऋणों में से अति लघु क्षेत्र के लिए ऋण का चिह्नांकन
- लघु उद्योगों के लिए बैंकों की विशेष शाखाएं खोलना
- जोखिम पूंजी समर्थन के लिए राष्ट्रीय इक्विटी निधि की स्थापना
- भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकास और आधुनिकीकरण निधि
- कुल कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं का मूल्यांकन करने के लिए टर्नओवर सीमा में वृद्धि करना
- संयुक्त ऋण सीमा को बढ़ाकर 10 लाख रुपए (रुपए1 मिलियन) करना
- रुपए 5 लाख (रुपए 0.5 मिलियन) तक के ऋणों पर कोई संपार्श्विक प्रतिभूति नहीं
30 अगस्त, 2000 को घोषित व्यापक नीति पैकेज ने इस प्रक्रिया को और विस्तार दिया है। इसमें सम्मिलित हैं :-
- रुपए 25 लाख (रुपए 2.5 मिलियन) तक के ऋणों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना को प्रारंभ करना
- प्रौद्योगिकी उन्नयन हेतु लिए गए ऋणों पर सब्सिडी प्रदान करने के लिए ऋण संबद्ध पूंजीगत आर्थिक सहायता योजना को प्रारंभ करना
- संयुक्त ऋण सीमा को पुन: बढ़ाकर रुपए 25 लाख (रुपए 2.5 मिलियन) करना
- राष्ट्रीय इक्विटी निधि के अंतर्गत परियोजना लागत सीमा को बढ़ाकर रुपए 50 लाख (रुपए 5 मिलियन) करना
उपर्युक्त अधिकांश कदम नायक समिति, कपूर समिति और डॉ. एस.पी. गुप्ता समिति की अनुशांसाओं के आधार पर उठाए गए हैं।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लघु उद्योगों को ऋण
निम्नलिखित सारणी वर्ष 1991 से ग्रामीण और लघु उद्योगों को ऋण के प्रवाह की स्थिति दर्शाती है :-
वर्ष |
निवल बैंक ऋण
(करोड़ रुपए में) |
लघु उद्योगों को
(करोड़ रुपए में) |
लघु उद्योगों की हिस्सेदारी |
मार्च, 1991 |
1,05,632 |
16,783 |
15.89% |
मार्च, 1992 |
1,12,160 |
17,398 |
15.51% |
मार्च, 1993 |
1,32,782 |
19,388 |
14.60% |
मार्च, 1994 |
1,40,914 |
21,561 |
15.30% |
मार्च, 1995 |
1,69,038 |
25,843 |
15.29% |
मार्च, 1996 |
1,84,381 |
29,485 |
15.99% |
मार्च, 1997 |
1,89,684 |
31,542 |
16.60% |
मार्च, 1998 |
2,18,219 |
38,109 |
17.50% |
मार्च, 1999 |
2,46,203 |
42,674 |
17.33% |
मार्च, 2000 |
2,92,943 |
45,788 |
15.6% |
मार्च, 2001 |
3,40,888 |
48,445 |
14.2% |
मार्च, 2002 |
3,96,954 |
49,743 |
12.5% |
मार्च, 2003 |
4,77,899 |
52,988 |
11.1% |
स्रोत : भारतीय रिज़र्व बैंक
निम्नलिखित सारणी वर्ष 1995 से अत्यंत लघु क्षेत्र को ऋण प्रवाह की स्थिति दर्शाती है :-
| |
मार्च, 95 के अंत में |
मार्च, 96 के अंत में |
मार्च, 97 के अंत में |
मार्च, 98 के अंत में |
मार्च, 99 के अंत में |
मार्च, 2000 के अंत में |
मार्च, 2001 के अंत में |
मार्च, 2002 के अंत में |
मार्च, 2003 के अंत में |
अति लघु क्षेत्र को निवल ऋण (करोड़ रुपए में) |
7734 |
8183 |
9515 |
10273.13 |
8837.47* |
22,742** |
26,019 |
27,030 |
26,937 |
निवल लघु उद्योग ऋण के प्रतिशत के रूप में अति लघु ऋण |
29.93 |
27.76 |
30.2 |
27.0 |
20.7 |
54.03 |
53.7 |
54.34 |
50.84 |
*रुपये 5 लाख तक पी एंड एम में निवेश वाली इकाइयों को दर्शाता है।
**रुपये २२ लाख तक पी एंड एम में निवेश वाली इकाइयों को दर्शाता है।
नोट: रुपये 1 करोड़ = रुपये 10 मिलियन, रुपये 1 लाख = रुपये 100,000/-
राज्य वित्त निगमों द्वारा लघु उद्योगों की सहायता
राज्य वित्त नि गमों का मुख्य उद्देश्य लघु उद्योगों की आवधिक ऋण/स्थायी पूंजी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। इस समय देश में कुल 18 राज्य वित्त निगम हैं।
निम्नलिखित सारणी राज्य वित्त निगमों द्वारा लघु उद्योगों को प्रदत्त कुल सहायता को दर्शाती है :-
वर्ष |
स्वीकृतियां (करोड़ रुपए में) |
संवितरण (करोड़ रुपए में) |
कुल सहायता |
लघु उद्योगों को |
कुल सहायता |
To SSIs |
1992-93 |
2015.3 |
1686 |
1557.4 |
1163.9 |
1993-94 |
1908.8 |
1561 |
1563.4 |
1175.2 |
1994-95 |
2702.4 |
1920 |
1880.9 |
1314.5 |
1995-96 |
4188.5 |
2513 |
2961.1 |
1675.4 |
1996-97 |
3544.8 |
2115 |
2782.7 |
1529.6 |
1997-98 |
2626.0 |
1786 |
2110 |
1222 |
1998-99 |
1864 |
1365 |
1625 |
1004 |
1999-2000 |
2203 |
1617 |
1754 |
1083 |
स्रोत : भारतीय औद्योगिक विकास बैंक वार्षिक रिपोर्ट
ऋण प्रवाह को बेहतर बनाना
नायक समिति (1991-92)
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा वर्ष 1991 में लघु उद्योगों को ऋणों की पर्याप्तता और समयबद्धता पर रिपोर्ट देने के लिए नायक समिति का गठन किया गया था जिसने अपनी रिपोर्ट सितम्बर, 1992 में प्रस्तुत की थी। नायक समिति ने पाया कि लघु उद्योग क्षेत्र अपने वार्षिक उत्पादन के 8.1 प्रतिशत तक कार्यशील पूंजी प्राप्त कर रहा है जो कि 20 प्रतिशत की मानकीय आवश्यकता से कम थी। तदनुसार नायक समिति ने अनुशंसा की कि लघु उद्योग क्षेत्र को कार्यशील पूंजी के रूप में अपने संभावित वार्षिक टर्नओवर का 20 प्रतिशत मिलना चाहिए। इनके आधार पर तथा साथ ही साथ नायक समिति की अनुशंसाओं के आधार पर भारतीय रिज़र्व बैंक ने संभावित वार्षिक टर्नओवर के 20 प्रतिशत तक कार्यशील पूंजी प्रदान करने, ऋण आवेदनों का समयबद्ध तरीके से निपटान करने तथा अधिक संख्या में लघु उद्योग वाले क्षेत्रों में लघु उद्योग ऋणों के लिए विशेषज्ञ शाखाएं खोलने संबंधी अनेक मार्गदर्शिकाएं बैंकों को जारी कीं। यह प्रति मान 5 करोड़ रुपये तक के वार्षि क टर्नओवर वाली इकाइयों पर लागू होगा।
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सात सूत्रीय कार्य योजना (1995-96)
नायक समिति की अनुशांसाओं के अनुपालन के रूप में, केंद्रीय वित्त मंत्री ने 1995-96 के बजट भाषण में लघु उद्योग क्षेत्र के ऋण प्रवाह की स्थिति सुधारने के लिए सात सूत्रीय कार्य योजना की घोषणा की। इसमे निम्नलिखित सम्मिलित हैं :-
- बैंकों की विशेष लघु उद्योग शाखाएं खोलना
- शाखा और क्षेत्रीय स्तर पर शक्तियों का अधिक प्रत्यायोजन
- बैंकों द्वारा अपने निष्पादित लघु उद्योग खातों के नमूना सर्वेक्षण आयोजित करना
- यथासंभव संयुक्त ऋणों की संस्वीकृति
- लघु उद्यमियों से नियमित बैठकें
- लघु उद्योग क्षेत्र के प्रति बैंक प्रबंधकों को संवेदनशील बनाना, और
- बैंकों द्वारा प्रक्रियागत औपचारिकताओं का सरलीकरण करना
उपर्युक्त कार्य योजना पर बैंकों द्वारा कार्यवाही की गई है।
कपूर समिति (1997-98)
दिसम्बर, 1997 में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा श्री एस.एल. कपूर, तत्कालीन सदस्य, औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड की अध्यक्षता में अन्य विषयों के साथ-साथ निम्नलिखित की समीक्षा करने के लिए एक-सदस्यीय समिति का गठन किया :-
- प्रशासकीय संदर्भ में व्यवस्था को अधिक प्रभावी, सरल और कुशल बनाने की दृष्टि से लघु उद्योगों की ऋणापूर्ति की कार्य-पद्धति, और
- व्यवस्था और कार्य प्रणाली के सरलीकरण तथा सुधार हेतु उपाय सुझाना। समिति ने 30 जून, 1998 को अपनी 126 अनुशंसाओं वाली रिपोर्ट भारतीय रिज़र्व बैंक को सौंपी। 126 अनुशंसाओं में से 103 की भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जांच की गई और निर्णय लिए गए। बैंक/वित्तीय संस्थान और अन्य एजेंसियां पहले ही 86 अनुशंसाओं को कार्यान्वित कर चुके हैं। समिति की अनुशंसाओं के अनुपालन में किए गए कुछ मुख्य उपायों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं :-
- भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक को भारतीय औद्योगिक विकास बैंक से अलग करना
- अधिक विशेष शाखाओं को खोलना
- संयुक्त ऋण की सीमा को रुपए 2.00 लाख से बढ़ाकर रुपए 5.00 लाख करना
- डी आर टी स्थापित करना
- ऋण गारंटी योजना प्रारंभ करना
- संपार्श्विक प्रतिभूति की छूट सीमा को रुपए 25,000/- से बढ़ाकर रुपए 5.00 लाख करना
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लघु उद्योगों को ऋण प्रवाह में सुधार के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा उठाए गए अन्य कदम
क. यह सुनिश्चित करने के लिए कि लघु उद्योग क्षेत्र के सभी अंगों को ऋण उपलब्ध रहे, भारतीय रिज़र्व बैंक ने निर्देश जारी किए हैं कि लघु उद्योग क्षेत्र के लिए साधारणत: उपलब्ध निधियों में से 40 प्रतिशत उन इकाइयों को दिए जाएं जिन्होंने मशीनरी और प्लांट में रुपए 5 लाख तक निवेश किया है, 20 प्रतिशत उन इकाइयों को जिनका निवेश रुपए 5 लाख से रुपए 25 लाख के बीच है और शेष 40 प्रतिशत अन्य इकाइयों को दिए जाएं।
ख. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को परामर्श दिया गया है कि वे उन क्षेत्रों में अधिकाधिक विशेष लघु उद्योग शाखाओं का परिचालन करें जहां लघु उद्योगों के लिए ऋण लेने वाले बहुत-से लोगों को वित्त प्रदान करने की अधिक गुंजाइश हो। मार्च, 2002 की स्थिति के अनुसार, देश भर में 391 विशेष लघु उद्योग शाखाएं कार्यरत हैं।
ग. लघु उद्योगों की वित्तीय आवश्यकताओं (आवधिक ऋण और कार्यशील पूंजी दोनों) की पूर्ति के लिए 'एकल खिड़की योजना' का सभी जिलों में विस्तार।
घ. लघु उद्योगों की ऋण लागत को कम करने की दृष्टि से बैंकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अच्छे निष्पादन वाले लघु उद्योगों को प्राइम लैंडिंग पर निम्न विस्तार का लाभ प्रदान करें।
च. लघु उद्योगों के ऋण प्रस्तावों पर त्वरित निर्णय लेने के क्रम में बैंकों को अपनी विशेष लघु उद्योग शाखाओं के शाखा प्रबंधकों को अधिक शक्तियां प्रत्यायोजित करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि अधिकांश ऋण प्रस्तावों पर शाखा स्तर पर ही निर्णय लिया जा सके।
छ. लघु उद्योगों, अत्यंत लघु उद्यमों, खुदरा व्यवसायियों और कारीगरों को सरलीकृत तथा ऋणप्राप्तकर्ता के लिए मित्रवत ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा लघु उद्यमी क्रेडिट कार्ड योजना प्रारंभ की गई है।
ज. लघु उद्योगों पर पीएलआर से 2 प्रतिशत उच्च एवं निम्न ब्याज दर बैंड लागू होगा।
झ. बैंकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्वयं विगत वर्ष की उपलब्धियों तथा निवल बैंक ऋण की वृद्धि में संपूर्ण ट्रीड के आधार पर लघु उद्योग क्षेत्र को अग्रिमों में वृद्धि के लक्ष्य निर्धारित करें।
ट. बैंक रुपये 50,000, रुपये 50,000 से रुपये 2,00,000 तथा रुपये 2 लाख से ऊपर के ऋणों पर ब्याज दरों के लिए तीन स्तर बनाएं।
ठ. संयुक्त ऋण की सीमा को रुपये 25 लाख से बढ़ाकर रुपये 50 लाख किया जाना।
ड. पात्र मामलों में संयुक्त मुक्त ऋणों की सीमा रुपये 25 लाख तक बढ़ाया जाना।
ढ. बैंक दर पर ब्याज अर्जित करने के लिए भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक के साथ विदेशी बैंकों में जमा।.
त. लघु उद्योग क्षेत्र को ऋण प्रवाह हेतु कार्यदल का गठन।
वर्ष 2003-04 के लिए बैंक के वार्षिक क्रेडिट प्लान में चिह्नित क्लस्टर्स में ऋण आवश्यकताओं को समाविष्ट करना
समीक्षा समिति के निर्णयों के अनुपालन के रूप में लघु उद्योग विकास मंत्रालय ने भारतीय रिज़र्व बैंक को लघु उद्योगों के केंद्रित विकास के लिए 60 चिह्नित क्लस्टर्स की सूची अग्रेषित की थी ताकि सभी सार्वजनिक क्षेत्र बैंकों में सूचना का प्रसार किया जा सके। भारतीय रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी एसएलबीसी संयोजक बैंक लघु उद्योगों के केंद्रित विकास के लिए लघु उद्योग मंत्रालय द्वारा चिह्नित 60 क्ल्स्टरों के संबंध में राज्य ऋण वार्षिक योजना में ऋण आवश्यकताओं को समाविष्ट करने के लिए कार्रवाई प्रारंभ करेंगे। 1 सितंबर, 2003 को भारतीय रिज़र्व बैंक, मुम्बई में आयोजित स्थायी परामर्शदात्री समिति की बैठक में लिए गए निर्णयानुसार भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बैंकों को निर्देश दिए गए हैं कि वर्ष 2003-04 के लिए बैंकों के वार्षिक ऋण प्लान में चिह्नित क्ल्स्टरों में ऋण आवश्यकताओं को समाविष्ट किया जाए।
बैंकों द्वारा विभिन्न योजनाओं/सुविधाओं जैसे संपार्श्विक-मुक्त/संयुक्त ऋण का पर्याप्त प्रचार
1 सितंबर, 2003 को आयोजित स्थायी परामर्शदात्री समिति की बैठक के निर्णयानुसार, बैंक टीयूएफ /राष्ट्रीय इक्विटी निधि/खादी और ग्रामोद्योग आयोग/लघु उद्योगों के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट आदि के अंतर्गत अपनी योजनाओं/सुविधाओं जैसे संपार्श्विक मुक्त/संयुक्त ऋणों और योजनाओं का पर्याप्त प्रचार करना होगा।
शीर्ष ऋण दर (पीएलआर) के 2 प्रतिशत उच्च एवं निम्न ब्याज दर बैंड
केंद्रीय बजट 2003-04 में माननीय वित्त मंत्री द्वारा की गई घोषणा के अनुसार भारतीय बैंक संघ ने लघु उद्योग इकाइयों को अग्रिमों के लिए बैंकों को अपनी शीर्ष ऋण दर (पीएलआर) के 2 प्रतिशत उच्च एवं निम्न ब्याज दर बैंड अपनाने का निर्देश दिया है।
लघु उद्योग अग्रिमों पर विभिन्न बैंकों की ब्याज दर देखें
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