आज के युग में विपणन
आज के युग में विपणन का अर्थ मात्र वस्तुओं को बेचना ही नहीं है। लघु उद्यमों के लिए एक बड़े कारपोरेशन के विज्ञापन समर्थन अथवा वितरण पहुंच की समानता करना अत्यंत कठिन है। भारत में लघु इकाइयां सीमित अथवा निकटतम बाजारों में अथवा जब एक न्यून मात्रा में विशेषीकृत मांग प्राप्त होती है जिसे कोई बड़ा खिलाड़ी प्रभावी तौर पर पूरा नहीं कर पाता हैं, तभी सर्वोत्तम बिक्री कर पाते हैं। अब लघु इकाइयों की विपणन गतिविधियों को उनके प्रतिस्पर्धात्मक लाभ जैसे श्रम गहनता वाले उत्पाद, उपेक्षित बाजारों वाली वस्तुएं, न्यून मात्रा उच्च लाभ वाले उत्पाद, कलपुर्जों को जोड़ने संबंधी, आउटसोर्सिंग नौकरियों संबंधी तथा अनुषंगीकरण के आसपास ही निर्मित करने का प्रयास है। इस प्रकार के वातावरण के संवर्धन के लिए सरकार और औद्योगिक संघों के माध्यम से उप-संविदात्मक एक्सचेंज स्थापित किए जा रहे हैं। विदेशी उत्पादों की बिक्री बाद सेवा, इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों की वार्षिक देखभाल अनुबंध, रिवर्स इंजीनियरिंग (जहां तक यह विश्व व्यापार संगठन के अनुरूप हो) ऐसे अन्य क्षेत्र हैं जिन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है।
ब्रांड बिल्डिंग, हानि सहन करना, उत्पाद पोर्टफोलियो का विस्तार, राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन, लंबी-चौड़ी बिक्री फौज, बड़े पैमाने पर निर्यातों से प्रतिस्पर्धा ऐसी गतिविधियां हैं जिन्हें बड़े खिलाड़ियों के लिए छोड़ देना ही सर्वोत्तम है। भारत में लघु उद्योग यह महसूस कर रहे हैं कि "विपणन" शब्द संभवत: भिन्न लोगों के लिए भिन्न चीजों की ओर संकेत करता है। नई शुरूआत के लिए पहले से स्थापित बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा करना समझदारी नहीं कही जा सकती। इस चूहेदानी में फंसकर स्वत: बिक्री बढ़ाने और अधिक लाभ कमाने की ओर नहीं बढ़ा जा सकता।
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